-फरीद वारसी

मौजूदा वक्त में कोरोना की दूसरी लहर से मचे तांडव ने जिसमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ है और हो रहा है, उसको लेकर सारे देश में जहां हाहाकार मचा हुआ, वहीं देश में दूसरी बहुत सारी गतिविधियों पर भी विराम सा लग गया है। उसमें राजनीति का विमर्श भी शामिल है। विदित हो कि गत दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आए। जहां ममता और वामदलों ने अपने-अपने राज्यों में शानदार तरीके से वापसी की, वहीं पश्चिम बंगाल में भाजपा को मुंह खानी पड़ी। रहा सवाल कांग्रेस का तो हार की नियति ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पश्चिम बंगाल में जहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला, वहीं केरल और असम में कांग्रेस उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी । तमिलनाडु की जीत कांग्रेस की खुद की नहीं, बल्कि द्रमुक की उंगली पकड़ कर मिली। जबकि केंद्र शासित राज्य पुडुचेरी कांग्रेस के हाथ से निकल गया।
माना जा रहा है कि कांग्रेस की हार के कारण प्रमुख रूप से स्थानीय स्तर पर नेता, नीति का अभाव और गुटबाजी व खासतौर से गठबंधन को लेकर सही निर्णय का न लिया जाना ही कांग्रेस की हार की पटकथा लिखने के लिए पर्याप्त रहा। जैसे केरल में कांग्रेस ने वामदलों के साथ महाभारत किया, वहीं बंगाल में वामदलों के साथ भरतमिलाप। परिणाम यह रहा कि कांग्रेस को दोनों ही राज्यों में कुछ हाथ नहीं लगा। कहा जाता है कि ममता तो कांग्रेस के साथ गठबंधन करने को तैयार थीं। लेकिन ऐसा न करने के लिए अधीर रंजन चौधरी ने राहुल गांधी को सलाह दी थी। अब ऐसे में राहुल अपने प्रिय नेता अधीर रंजन से सवाल-जवाब करने की जहमत करेंगे । कांग्रेस को ऐसे नेताओं ने बहुत नुकसान पहुँचाया है, जो राहुल को आगे कर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं। बहरहाल, कहना गलत न होगा कि पांच राज्यों में कांग्रेस की शर्मनाक हार से गांधी परिवार विशेषकर राहुल और प्रियंका गांधी की पकड़ पार्टी पर कमजोर पड़ेगी।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो इतिहास खुद को दोहराता है। लगातार हार का न थमने वाला सिलसिला। अनिश्चय और निराशा के दौर से गुजर रही देश की सबसे पुरानी पार्टी क्या अपना पुराना दौर हासिल कर पाएगी। इस पर सवालिया निशान और भी गहरा हो गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर पार्टी ने नेतृत्व के अपने बहुचर्चित सवाल को हल नहीं किया तो कांग्रेस एक और विभाजन की ओर ब़ढ़ सकती है। जी-23 समूह के नेता कोरोना संकट के चलते भले ही अभी खामोश दिख रहे हों लेकिन वे कभी भी मुखर हो सकते हैं इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। यहां यह बताते चले कि शरद पवार ने अभी भी कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की अपनी पुरानी मंशा को त्यागा नहीं है। इसके अलावा कांग्रेस का विभाजन जहां भाजपा को लाभ पहुंचाने वाला साबित हो सकता है, वहीं खुद इससे कांग्रेस का कुछ भला होने वाला नहीं और ऐसे में गांधी परिवार की राजनीतिक साख धूमिल होगी सो अलग।
सबसे बड़ी बात यह कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावना पर विपरीत असर न डाले इसके लिए सोनिया गांधी को नेतृत्व की पहेली को हल करने के लिए कोई पहल जल्द करनी होगी जो खुद पुत्र मोह के चलते राहुल से इतर कुछ और सोचने को तैयार दिखती नजर नहीं आ रही हैं। और राहुल हैं जो सोनिया गांधी के बीमार होने के कारण भले ही अध्यक्ष पद की सारी ताकत का प्रयोग कर रहें हों, लेकिन अब तक अपनी छाप छोड़ने में नाकाम साबित हुए है। हालांकि शायद ही जनहित का ऐसा कोई मुद्दा हो जिस पर राहुल मोदी और भाजपा को न घेरते हों , लेकिन ऐसे कौन से कारण है कि उनकी बातों का असर कांग्रेस को लाभ नहीं पहुंचा रहा है, उनकी भी तलाश राहुल को खुद ही करना होगी।
समाचारों के अनुसार कोरोना की भयावह तेज गति के कारण कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव 23 जून तक खारिज कर दिया गया है। जिसका कांग्रेस के कुछ नेताओं ने विरोध भी किया। यह विरोध अकारण नहीं है वह इसलिए कि नेतृत्व का मसला हल न होने के कारण कांग्रेस का काफी नुकसान हुआ है। वहीं कांग्रेस कार्य समिति की बैठक को संबोधित करते हुए पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि पार्टी को विधानसभा चुनावों में मिली हार के कारणों पर गंभीरता से विचार करना होगा। जनता का मन जीतना होगा। पार्टी छोटे समूह गठित करे, हार के हर पहलू पर विचार करे और जल्द ही अपनी रिपोर्ट दे।
विदित हो कि हर हार के बाद सबक सीखने का यह आश्वासन पुराने राग की तरह हो गया है। हार की जांच की तमाम रिपोर्टे धूल फांक रही हैं। शायद ही किसी पर अमल किया गया हो। 2014 के बाद से लेकर अब तक कांग्रेस ने खुद अपना मंथन कितनी ईमानदारी से किया, कांग्रेस अगर इस बात को गौर करे तो ज्यादा बेहतर होगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को जल्द ही कुछ प्रभावशाली पहल करनी होगी ताकि अगले साल उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में वह भाजपा को चुनौेती दे सके। पंचायत चुनाव के परिणामों से संकेत मिल रहा है कि जहां योगी सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है, वहीं प्रियंका गांधी की मेहनत रंग ला रही है। इसलिए यहां देर करने की जरूरत नहीं, बल्कि जल्द ही बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
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