सियासी ज़मीरफ़रोशी कब तक!

देश में जो मौजूदा सियासी हालात बनते जा रहे हैं उसके बाद तो इनकी जन्मदर में और भी तेज़ी आने की उम्मीद है
 
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अमित बिश्‍नोई

अपनी अंतरआत्मा का सौदा करने वालों को ज़मीरफ़रोश कहते हैं. वैसे तो ज़मीर फरोश जीवन के हर क्षेत्र में मिलते हैं लेकिन सियासत के ज़मीरफ़रोशों की बात निराली है, यह वो क़ौम है जो बड़ी तेज़ी से फल फूल रही है, जिसकी खेती पिछले कुछ सालों से बड़े पैमाने पर होने लगी है. देश में जो मौजूदा सियासी हालात बनते जा रहे हैं उसके बाद तो इनकी जन्मदर में और भी तेज़ी आने की उम्मीद है क्योंकि अब देश में विपक्ष विहीन राजनीति की बात हो रही है, ज़ाहिर है कि इसके लिए साम दाम दंड भेद सब कुछ अपनाना पड़ेगा और जो अपनाया भी जा रहा है. देश में बिकने वाली भी एक ही पार्टी है और खरीदने वाली पार्टी भी एक ही है. खरीदने वाली पार्टी का एक सपना है कि देश से विपक्ष को समाप्त किया जाय और इस काम में उसकी मदद एक ही पार्टी कर रही है जो हकीकत में उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है लेकिन उसके सांसदों और विधायकों का ज़मीर मर चूका है, हर दम बिकने को तैयार बैठे रहते हैं, कि कब कोई खरीदार आ जाय और उनकी बोली लगाकर उन्हें खरीदे। 

गोवा में आज कांग्रेस के 11 में से आठ विधायक भाजपा में चले गए, भाजपा की तो गोवा में सरकार है. भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों की विचारधारा में ज़मीन आसमान का अंतर है, इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि कोई कांग्रेसी अगर भाजपा में जाता है तो वो कांग्रेसी नहीं हो सकता और इसी तरह भाजपा से कोई कांग्रेस में जाता है तो वो भाजपाई नहीं हो सकता। यह सब वो लोग हैं जो अपना ईमान बेचते हैं. गोवा में इन ज़मीरफ़रोश कांग्रेसी विधायकों के भाजपा में जाने से गोवा की सियासत पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा? कोई नहीं। लेकिन इमेज ज़रूर क्रिएट होगी, कांग्रेस से भरोसा उठने की इमेज। पिछले आठ सालों से इमेज का ही तो खेल हो रहा है. धरातल पर भले ही कुछ न हो लेकिन इमेज लोगों को वहीँ दिखनी चाहिए जो हम दिखाना चाहते हैं. गोवा कांग्रेस में बगावत भी उसी इमेज बिल्डिंग और इमेज destroy के खेल का हिस्सा है. अगर हमारी इमेज अच्छी नहीं है तो दूसरे की खराब करके उसे अच्छा बनाना आज के दौर की सियासत है. 

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भाजपा अब इक्के दुक्के में नहीं बल्कि बल्क में डीलिंग करने लगी है, मणिपुर हो, कर्नाटक हो, महाराष्ट्र हो, मध्य प्रदेश हो और अब गोवा। बल्क डीलिंग के यह उदाहरण अब बढ़ते ही जायेंगे क्योंकि बिकने वाले अब बल्क में मिलने लगे हैं. इक्का दुक्का वाला ज़माना अब चला गया. एकमुश्त टूटकर सौदा भी अच्छा होता है, एंटी डिफेक्शन का थोथा कानून भी लागू होने का खतरा नहीं रहता, वैसे खरीदार पार्टी इतनी मज़बूत है कि उसके सामने नियम और कानून भी थर थर कांपते हैं. 

लेकिन सवाल यह है सांसदों और विधायकों की यह मंडी कब तक सजेगी, कब तक मतदान का चीरहरण होता रहेगा, कब तक ये ज़मीरफ़रोश वोटर्स के साथ दग़ाबाज़ी करते रहेंगे। बहुत गंभीर विषय है, सोचना तो पड़ेगा। चुनाव आयोग को इस मामले में आगे आना चाहिए, सरकार अगर इस मामले में कुछ नहीं कर रही है तो देश की शीर्ष अदालत को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। कानून बनना चाहिए, आपको कोई पार्टी छोड़कर किसी और पार्टी में जाना है शौक से जाइये, मगर जाने से पहले अपनी सांसदी और विधायकी को भी वहीँ छोड़ जाना चाहिए। जाइये नई पार्टी में, नए सिरे से बनिए सांसद, विधायक। मगर यह बुज़दिल लोग ऐसा हरगिज़ नहीं करेंगे और न ही कोई सियासी जमात इस मामले में आगे आएगी। खरीदार पार्टी से तो ऐसी कोई उम्मीद रखना बेकार है लेकिन क्या कांग्रेस पार्टी (हमेशा जिसके माननीय बिक जाते हैं) में इस बारे में कोई पहल करने की हिम्मत है, क्या वो यह घोषणा कर सकती है कि हमारी सरकार बनने पर हम कानून में संशोधन करेंगे और इस बात को यकीनी बनाएंगे कि पार्टी छोड़ने से पहले सांसदी और विधायकी को छोड़ना अनिवार्य होगा। मेरा दावा है कि अगर यह हो जाय तो ज़मीरफ़रोशों की खरीद फरोख्त पर बहुत हद अपने आप लगाम लग जाय.