एक हाईप्रोफाइल महंत की मौत

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एक हाईप्रोफाइल महंत की मौत

अमित बिश्‍नोई

वैसे तो पिछले चार सालों में उत्तर प्रदेश में चालीस से भी ज़्यादा संत, साधू और महंतो की अप्राकृतिक रूप से मौत हुई है मगर प्रयागराज बाघंबरी मठ के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि की मौत इन सबसे थोड़ी अलग है. एक हाईप्रोफाइल महंत की मौत जिसने सरकार और राजनेताओं को भी झकझोर दिया। मामला कितना संवेदनशील है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर इस मामले को अपने हाथों में लिया, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद मठ गए और किसी भी आरोपी को न बख्शने की बात कही, सभी विपक्षी पार्टियों के बड़े नेता महंत नरेंद्र गिरी की मौत पर विचलित हो गए. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रयागराज जाकर महंत जी को श्रद्धांजलि अर्पित की. कहने का मतलब यह कोई आम महंत की नहीं बल्कि ख़ास महंत की मौत का मामला है.

चूंकि यूपी में चुनावी मौसम चल रहा है, ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी त्वरित करते हुए मामले की जांच के लिए लम्बी चौड़ी SIT गठित कर दी. जब संत समाज फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ तो जांच सीबीआई को सौंप दी गयी, सीबीआई भी तुरंत एक्शन में आयी और केस को फौरी तौर पर अपने हाथों में लेकर युद्ध स्तर पर जांच को आगे बढ़ाने में जुट गयी. सीबीआई की जांच के दायरे में हर वह व्यक्ति है जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से महंत नरेंद्र गिरी के संपर्क में पिछले कुछ महीनों से रहा है. वैसे तो महंत जी के सुसाइड नोट में साफ़ तौर पर उनके शिष्य रहे महंत आनंद गिरी, हनुमान मंदिर के पुजारी आद्या तिवारी और उनके बेटे संदीप तिवारी का नाम है. यह सब गिरफ्तार भी हो चुके हैं मगर जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है बहुत सारे ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जिनके जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो होगा कि मामला आत्महत्या का है या कुछ और.

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चूँकि इस हाई प्रोफाइल की मौत अब जांच के दौर में है इसलिए इसपर स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी। हो सकता है यह आत्महत्या ही हो और अपने सुसाइड नोट में महंत नरेंद्र गिरी ने जो लिखा है वह अक्षरशः सच भी हो मगर सच यह भी है कि राजनीतिक की तरह धर्म स्थलों में सत्ता पर क़ाबिज़ होने की जंग लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि इन मठों, मंदिरों, अखाड़ों से बेहिसाबी पैसा भी जुड़ा है और नाम भी जिनको हासिल करने के लिए अधर्मी हथकंडे अपनाने की प्रवृति भी बढ़ती जा रही है.

मीडिया में रोज़ ही इस केस के बारे में लगातार खुलासे हो रहे हैं, कभी पुलिस के सूत्रों से तो कभी अपने विश्वस्त (भले ही उनका कोई वजूद न हो) सूत्रों से. घटना तो वैसे ही तब संदिग्ध मानी जाने लगती है जब पता चलता कि घटनास्थल के पास लगा कैमरा नाकारा था. वैसे तो इस केस में बहुत से ऐसे सवाल हैं जो अपने आप में एक सवाल हैं. सीबीआई भी उन सवालों के जवाब मठ में ढूंढ रही है और उम्मीद यही कि जल्द ही वह किसी निष्कर्ष पर पहुँच जाएगी।

अब अगर हम बात थोड़ा राजनीतिक एंगल की करें तो महंत जी के राजनीतिक संबंधो के बारे में सब जानते हैं, समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार से उनके घनिष्ट सम्बन्ध रहे हैं , मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी उनका करीबी माना जाता है. अब अचानक उनकी इस अप्राकृतिक मौत पर राजनीति होना भी आम बात है. प्रदेश में मौसम चुनावी है और योगी सरकार के लिए राजनीतिक हालात भी उतने सहज नहीं है इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में विपक्ष को कोई मौका नहीं देना चाहते और यही वजह कि इस पूरे मामले में वह जिस तरह से सक्रीय हुए है और मामले को सीधा अपने हाथों में लिया है ऐसी सक्रियता उन्होंने पिछले चार साल में हुई ऐसी किसी भी घटना में नहीं दिखाई। 2019 में श्री निरंजनी पंचायती अखाड़ा के सचिव महंत आशीष गिरि की संदिग्ध हालात में मौत, औरैया में तीन साधुओं की सामूहिक हत्या, बुलंदशहर के एक मंदिर में सो रहे साधु की हत्या, लखनऊ में कबीर मठ के प्रशासनिक अधिकारी का उनके शिष्यों द्वारा मर्डर, पिछले चार सालों में ऐसी लगभग 42 घटनाएं हुईं, मगर योगी जी इतना एक्शन में कभी नज़र नहीं आये और न ही विपक्षी दल.

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लेकिन चूंकि मामला एक हाई प्रोफाइल महंत की मौत का है और मौसम भी चुनावी है, शायद इसलिए केंद्र से लेकर राज्य, पक्ष से लेकर विपक्ष, सभी महंत जी की मौत की तह में जाने की कोशिश कर रहे हैं. वैसे तो महंत जी मौत के पीछे सत्ता, पैसा और औरत यानी अपराध होने के तीनों एंगल नज़र आ रहे हैं मगर देखना है कि सीबीआई कौन सा एंगल निकालती है या फिर अन्य 42 मामलों की तरह यह मामला भी चुनावी शोर में कहीं दब जायेगा।

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