भारत जोड़ो पदयात्रा: बेदम कांग्रेस में क्या है इतना दम?

आर्टिकल/इंटरव्यूभारत जोड़ो पदयात्रा: बेदम कांग्रेस में क्या है इतना दम?

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अमित बिश्‍नोई

राजनीति में यात्राओं का बड़ा महत्व है, अब यह यात्राएं पदयात्रा हों या फिर रथ यात्रा। देश की आज़ादी में इन पदयात्राओं का असीम योगदान रहा है, आज़ादी के बाद भी बहुत सी राजनीतिक यात्राएं हुईं, रथयात्राएं हुईं और उन्होंने राजनीतिक परिदृश्य को बदल डाला, लाल कृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा को कौन भूल सकता है, भाजपा को भारतीय राजनीती में आज यह मुकाम दिलाने में इस रथयात्रा का सबसे अहम् योगदान है, यह अलग बात है कि इस रथ यात्रा के हीरो आज देश की और भाजपा की राजनीती में हाशिये पर डाल दिए गए हैं. 

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने भी अब एक पदयात्रा निकालने का निर्णय लिया है, उद्देश्य भारत को जोड़ना है यह यात्रा कश्मीर से कन्याकुमारी तक होगी और राहुल गाँधी इसका नेतृत्व करेंगे। कश्मीर से कन्याकुमारी का मतलब पूरा देश, कांग्रेस जनता से अपने टूटे रिश्ते को जोड़ने के लिए यह कवायद शुरू करेगी। यह पद यात्राएं हर जिला मुख्यालयों के 75 किलोमीटर के दायरे में आयोजित होंगी जिनकी ज़िम्मेदारी उस ज़िले के पदाधिकारियों की होगी। कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान के उदयपुर चिंतन शिविर में बहुत से क्रन्तिकारी प्रस्ताव पास किये, यह पदयात्रा उनमें से सबसे प्रमुख है।  

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इस पदयात्रा से कांग्रेस पार्टी पूरे देश में यह सन्देश पहुंचाएगी कि भाजपा देश को तोड़ रही और कांग्रेस पार्टी उसे जोड़ने के लिए निकली है. कांग्रेस ने नारा भी दिया है “जोड़ो जोड़ो भारत जोड़ो”. इस नारे से याद आती है “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” नारे की. महात्मा गाँधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी ने उस नारे को सार्थक कर दिया था और आज हम एक आज़ाद देश में सांस ले रहे हैं. कांग्रेस पार्टी ने अब एकबार फिर नारा दिया भारत जोड़ो का. यह काम भी अंग्रेज़ों को भारत से निकालने जैसा ही मुश्किल है मगर नामुमकिन नहीं। 

जहाँ तक कांग्रेस पार्टी के इस नारे का सवाल है तो बात यहाँ पर देश के टूटते सांप्रदायिक सौहार्द की हो रही न कि देश के किसी हिस्से के टूटने की. पिछले कुछ वर्षों में देश का सामाजिक ढांचा बिखरा और अब उसमें लगातार तेज़ी आती जा रही. बढ़ती मंहगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक गिरावट, टूटती करेंसी, सरपट भागते ईंधन के दाम जैसे अहम् मुद्दे गौण होते जा रहे हैं और लोग धर्म और आस्था के पीछे भाग रहे हैं. कोई सवाल उठाने वाला नहीं, सवाल पूछने वाला नहीं और न ही कोई जवाब देने वाला।

इस पदयात्रा के माध्यम से राहुल गाँधी इन्हीं सब बातों को लेकर जनता से कनेक्शन बनाने के लिए अक्टूबर में निकलेंगे। मौसम भी पदयात्रा के लिए मुफीद रहेगा, सर्दियों की शुरुआत हो चुकी होगी, पसीना भी काम निकलेगा क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कांग्रेसी गर्मी से बहुत परेशान हो जाते हैं, पसीने से उन्हें एलर्जी होती है. रहा सवाल पदयात्रा की सफलता का तो वह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस पार्टी इसे कितने योजनाबद्ध तरीके से आयोजित करेगी और कांग्रेस कार्यकर्ता इस अभियान को कामयाब बनाने के लिए पार्टी का किस स्तर साथ देते हैं. 

बेशक कांग्रेस पार्टी के पुनर्जीवन और पुरुत्थान के लिए उसे इसी तरह के किसी अभियान की ज़रुरत है जिसकी मदद से जनता से सीधा कनेक्शन किया जा सके. कांग्रेस पार्टी के पास न तो भाजपा जैसे नेता और कार्यकर्ता हैं और न ही भाजपा जैसी सोच. वहां साल के 365 दिन 24 घंटे सिर्फ चुनाव में जीत हासिल करने पर चर्चा होती और एक चुनाव जीतने के बाद ही अगले चुनाव की तैयारी शुरू हो जाती है. अभी मोदी जी लखनऊ आये और योगी-2 कैबिनेट को 2024 के चुनाव का टास्क दे गए. कांग्रेस पार्टी में ऐसा नहीं है इसलिए कश्मीर से कन्या कुमारी की पदयात्रा के लिए सिर्फ राहुल, प्रियंका को ही नहीं बल्कि पूरी कांग्रेस को उठना होगा।

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यह पदयात्रा कांग्रेस के वजूद को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी है, 2024 से पहले कई अहम् राज्यों के चुनाव हैं जिनमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी शामिल हैं जहाँ कांग्रेस पार्टी की सरकार है. इस पदयात्रा के माध्यम से कांग्रेस पार्टी ने अगर वाकई भारत जोड़ो का सन्देश प्रभावी ढंग से जनमानस तक पहुंचा दिया तो सत्ता भले न मिले मगर कांग्रेस के सर्वाइवल की शुरुआत ज़रूर हो जाएगी। अब सबकुछ इसपर निर्भर है कि वाकई इस पदयात्रा को कांग्रेस पार्टी गंभीरता से लेगी या फिर यह भी एक राजनीतिक इवेंट साबित होगा।

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