न्याय के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी सीबीआई के जज यादव जी ने

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न्याय के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी सीबीआई के जज यादव जी ने

उबैदुल्लाह नासिर

न्याय के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी सीबीआई के जज यादव जी ने

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले 28 वर्षों बाद आज आये CBI अदालत के फैसले पर जिसमें अडवानी जोशी उमा भारती विनय कटियार समेत सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया गया है मेरे जैसे करोड़ों भारतीयों को कोई अचरज नहीं हुआ है I विगत 8-10 वर्षों से अदालतों में यही ट्रेंड चल रहा है संघ परिवार से जुड़े मुलजिमों को निचली अदालतों से ही बरी कर दिया जा रहा है चाहे वह मक्का मस्जिद ब्लास्ट का मामला हो चाहे समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों का मामला हो इशरत जहां तुलसी प्रजापति रबाबुद्दीन आदि की ह्त्या का मामला हो हर जगह निचली अदालतों /CBI की अदालतों से इनको बरी कर दिया जाता है और निचली अदालतों के इन फैसलों के खिलाफ कभी भी हाई कोर्ट में अपील नहीं की जाती जैसे निचली अदालतें ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट हो गयी हो I भारत में न्याय व्यवस्था के इतने शर्मनाक और दुखद राजनैतिकरण संप्रदायीकरण और भगवाकरण की इससे पहले कोई मिसाल नहीं मिलती I

CBI की अदालत के जज सुरेन्द्र कुमार यादव ने निर्णय दिया है जो उनकी सेवा काल का आखिरी निर्णय भी है की सीबीआई अडवाणी joshi उमा भारती विनय कटियार समेत सभी 32 जीवित मुलजिमों के खिलाफ विध्वंस मामले में हाथ होने का सुबूत नहीं दे पायी है इस लिए इन सब को बरी किया जाता है सीबीआई की अदालत के इस फैसले से इस देश के करोरों लोगों को कोई हैरत नहीं हुई है क्योंकि विगत 8-10 वर्षों से यही हो रहा है की जिन मामलों में संघ के कार्यकर्ता शामिल होते हैं वह सब मामले नीचली /सीबीआई अदालत से ही ख़ारिज हो जाते हैं मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस ,इशरत जहां, तुलसी प्रजापति मोब लिंचिंग आदि सभी मामलों में यही हुआ और सीबीआई ने किसी भी मामले में हाई कोर्ट में अपील नहीं की जैसे निचली अदालत ही अंतिम अदालत हो मैं अयोध्या मामले की शुरू से रिपोर्टिंग कर रहा हूँ 1989 के शिलान्यास से लेकर 6 दिसम्बर 1992 को ढांचा गिराए जाने तक के सभी घटनाओं का चश्मदीद गवाह हूँ मेरे जैसे हज़ारों अन्य देशी विदेशी पत्रकार भी इन घटनाओं के गवाह हैं मैं ने सीबीआई अदालत और लिब्रहान कमीशन में भी गवाही दी है लिब्रहान कमीशन ने भी ढांचा गिराए जाने को साज़िश माना है और अडवाणी जोशी अदि के रोल पर टिपण्णी की हैं लगता है जज यादव जी ने लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट पढने का कष्ट ही नहीं किया है यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी मुस्लिम पक्ष की चार महत्व पूर्ण दलीलों को माना है 1- बाबरी मस्जिद किसी मंदिर के मलबे पर नहीं बनाई गयी थी 2- बाबरी मस्जिद में गैर कानूनी तौर से राम लला की मूर्ती रखी गयी थी 3-1949 तक बाबरी मस्जिद में नमाज होती थी 4 – बाबरी मस्जिद का तोड़ा जाना गैर कानूनी था यह साब बातें स्वीकार करने के बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि मंदिर निर्माण के लिए दे दी| सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ खुद सुप्रीम कोर्ट के कई रिटायर्ड जजों जस्टिस लोकुर जस्टिस काटजू जस्टिस मुखर्जी जस्टिस शाह जस्टिस सावंत आदि ने दुःख हैरत और नापसदी ज़ाहिर की थी

न्याय के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी सीबीआई के जज यादव जी ने

सीबीआई की अदालत ने अडवानी आदि को बरी करते हुए वर्षों तक चलने वाले अयोध्या मूवमेंट को ही नकार दिया है उन्हें न अडवाणी जी की रथ यात्रा याद रही न सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उततर प्रदेश सरकार के हलफनामे जिस मूवमेंट ने पूरे देश में आग लगा दी ह समाज को बाँट दिया हो जिसका सियासी प्रभाव आज भी देखा जा सकता है उस से जज यादव जी अनभिज्ञ हैं इस पर क्या कहा जा सकता है सीबीआई की अदालत में हज़ारों पत्रकारों ने गवाहियाँ दर्ज करवाई हैं उन सब को नकार कर ऐसा फैसला न्यायव्यवस्था पर सवाल तो खड़ा ही करेगा

सच्चाई तो यह है की राम जनम भूमि बाबरी मस्जिद विवाद में पहले दिन से ही अद्लातों का रवय्या मस्जिद विरोधी रहा है मस्जिद में रात के अँधेरे में छुप के रामलला की मूर्ती रख दी गयी लेकिन तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट ने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल के आदेश की अवहेलना करते हुए न केवल ज़बरदस्ती रखी गयी मूर्ती नहीं हटाई बल्कि मस्जिद के 200 गज के एरिया में मुसलमानों के दाखले पर भी पाबंदी लगा दी जबकि पूजा की इजाज़त दे दी इसी प्रकार फैजाबाद के सिविल जज ने दुसरे पक्ष को सुने बिना शाम 4 बजे ताला खोलने का आदेश दे दिया और उसे टीवी द्वारा प्रचारित भी करा दिया गया हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को तींन हिस्सों में बाँट कर 2 हिस्से मंदिर निर्माण को और एक हिस्सा मस्जिद के लिए दिया सुप्रीम कोर्ट ने तो “बेमिसाल” न्याय दिया और आज न्याय के ताबूत में आखिरी कील सीबीआई की अदालत ने ठोंक दी

कहा जाता है कि न्याय होना ही काफी नहीं है बल्कि न्याय हुआ यह दिखना भी चाहिए लेकिन विगत वर्षों में ऐसा नहीं हुआ सरकार और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं से जुड़े सभी मामलों में एक तरफा फैसला दिया गया है अभी अभी रिटायर हुए जस्टिस अरुण मिश्र के लिए तो कहा ही जाता है कि अडानी से जुड़े सात मामलों में उन्होंने अदानी के पक्ष में ही फैसला देने का रिकॉर्ड बना दिया है

बाबरी मस्जिद का सुप्रीम कोर्ट से फैसला आ जाने के बाद इस देश के अल्पसंख्यकों के लिए यह मसला मुर्दा हो चुका था सीबीआई की अदालत से अडवानी आदि को सज़ा होती या न होती अल्पसंख्यकों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी लेकिन देश के जनमानस को सोचना होगा की यदि न्याय धर्म, जाति और राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित होगा तो क्या इस से देश और समाज का भला होगा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की क्या इमेज बन रही है

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