अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 6.9 लाख करोड़ का बजट पेश किया है, उनके मुताबिक यह अमृतकाल का बजट है। आइये थोड़ा इसपर चर्चा की जाय. तो बता दें कि प्रदेश की GDP करीब 24 लाख करोड़ रूपये है जबकि प्रदेश पर कर्ज करीब 8.5 लाख करोड़ पहुँच गया है जोकि कुल राज्य GDP का 35.50 फीसद है। पूर्व में पेश बजट आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि वास्तविक आय व्यय बजट अपेक्षा से काफी कम रहा है। बजट के आंकड़ों से पता चलता है कि प्रदेश की आय का प्रमुख स्त्रोत आम जनता पर लगाये गए करों से है जबकि ग्रामीण क्षेत्र, शिक्षा-स्वास्थ्य व कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर नाममात्र खर्च है उसमें भी पिछले वर्ष की तुलना में तुलनात्मक रूप से खर्च में गिरावट दर्ज की गई है।
बजट का सबसे बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज में खर्च है जोकि कुल बजट के 43% से अधिक है। इसके अलावा सामाजिक कल्याण के महत्वपूर्ण मदों में बजट शेयर में गत वर्ष के सापेक्ष कमी आयी है। शिक्षा में बजट शेयर 12.2 % से घट कर 11.22%, स्वास्थ्य 6.67 % से घट कर 5.41 % , कृषि एवं संबद्ध क्रियाकलाप 2.8 फीसद से घटकर 2.37 %, सिंचाई एवं बाढ़ नियत्रंण 4.46 % से घटकर 1.86 %, समाज कल्याण में 5.08 फीसद से घटकर 4.63 % हो गया है।
पूंजीगत परिव्यय 147492 करोड़ रुपये है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ी चर्चा है लेकिन जो इस मद में जो खर्च किया गया है वह कारपोरेट्स व निजी क्षेत्र के मुनाफे व उपयोग के लिए है। जैसे मेडिकल कालेज, अस्पताल और तकनीकी संस्थाओं का निर्माण पीपीपी मॉडल के तहत हो रहा है. सरकार संसाधनों को इनके निर्माण में खर्च कर रही है जबकि निजी क्षेत्र के अधीन इनका संचालन होगा और प्राइवेट सेक्टर द्वारा बिना किसी खास निवेश के ही अथाह कमाई की जायेगी। इनमें प्राइवेट इंस्टीटूशन की तरह ही छात्रों से फीस की वसूली की जायेगी, PPP मॉडल से संचालित मेडिकल कॉलेज व हॉस्पिटल्स में मंहगा ईलाज होगा जबकि जरूरत है कि पब्लिक सेक्टर में एजुकेशन और हेल्थ के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाता। इसके अलावा अवस्थापना में प्रमुख रूप से एक्सप्रेस वे, मेट्रो आदि में खर्च किया गया है।
योगी सरकार के दावों के अनुसार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट से 33 लाख करोड़ के निवेश समझौते से प्रदेश के विकास और रोजगार सृजन की तस्वीर पेश की जा रही है। दरअसल इन तरह के आयोजनों के पूर्व के अनुभव के आधार पर जो तथ्य हैं उससे स्वतः स्पष्ट होता है कि जो प्रोपैगैंडा किया जा रहा है उससे वास्तविक स्थिति एकदम अलग है। बेरोजगारी के आंकड़ों का जो हवाला दिया जा रहा है कि 2017 के पूर्व बेरोजगारी की दर 14 फीसद थी जो घटकर 4.2 % हो गई है, प्रस्तुत किये ए तथ्यों से मेल नहीं खाता। प्रदेश में श्रमशक्ति भागीदारी दर 33% के करीब है। अन्य राज्यों में रोजी रोटी की तलाश में युवाओं का पलायन बढ़ता जा रहा है। बजट में ही उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन के आंकड़े बताते हैं कि 6 वर्षों में महज 12.50 लाख पंजीकरण और 4.88 लाख युवाओं को कंपनियों में रोजगार मिला है। हालांकि सर्वे रिपोर्ट है कि काम की बेहद खराब स्थिति और कम वेतनमान की वजह से इसमें से ज़्यादातर युवाओं ने प्लेसमेंट के बाद नौकरी छोड़ दी। इसी तरह प्रदेश में MSME सेक्टर पूरी तरह संकट में है, इनके पुनर्जीवन के लिए कुछ भी ठोस रूप से नहीं किया गया।
मनरेगा में 2022-23 में सिर्फ 26 लाख मानव दिवस सृजित हुए , इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 20 दिनों का काम उपलब्ध कराया गया है। प्रदेश में 6 लाख से ज्यादा पद खली पड़े हैं, इन्हें भरना भी अब प्रदेश सरकार के ऐजेंडा में नहीं है। आशा, आंगनबाड़ी आदि योजनाए वर्कर्स के सम्मानजनक वेतनमान के लिए भी इस बजट में किसी तरह का प्रावधान नहीं किया गया है। कुल मिलाकर इस बजट को कारपोरेट का मददगार बजट ही कहा जायेगा जनहित का नहीं।
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