सुनील शर्मा
22 मार्च 2020, आज से ठीक एक साल पहले कोरोना संक्रमण विश्व को अपनी चपेट में ले चुका था। उस वक्त दुनिया के 186 देश कोरोना संक्रमण का शिकार हो चुके थे। कुछ देशों से आ रही भयावह तस्वीरें मन में अंजान भय पैदा कर रही थीं। ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आहृवान पर 22 मार्च 2020 को देश में 14 घंटे का जनता कर्फ्यू लगाया गया। स्वत प्रेरित इस कर्फ्यू में जनता ने पूर्णतया सहयोग किया और देश पूरी तरह से ठहर गया। सड़कें सूनी थी तो लोग अपने घरों में बंद थे। बसों, रेलगाड़ियों के चक्के थम गये थे तो इमरजेंसी सेवाओं को छोड़कर सबकुछ बंद हो गया था। 22 मार्च के दिन सुबह 7 से रात 9 बजे तक लोगों ने जनता कर्फ्यू का अनुशासन के साथ पालन किया। इसी दिन शाम को लोगों ने ताली- थाली बजाकर कोरोना योद्धाओं के प्रति अपना आभार भी जताया था। यह दिन हर भारतीय को जीवनपर्यंत याद रहेगा क्योंकि यह शुरूआत थी देश में लाॅकडाउन की इसके साथ ही कोरोना संक्रमण की भयावहता देश में फैली और हमें लंबे समय तक लाॅकडाउन का सामना करना पड़ा।
वर्ष 2019 से विश्व में कोरोना संक्रमण के लक्षण दिखने शुरू हो गये थे और वर्ष 2020 की शुरूआत से ही चीन, अमेरिका, इटली आदि के भयावह हालात संक्रमण की गंभीरता को दर्शा रहे थे। जिस समय कोरोना संक्रमण पूरे विश्व को भयाक्रांत किये हुआ था तब भारत में कोरोेना संक्रमण की शुरूआत हो रही थी। 14 मार्च 2020 तक देश में कोरोना संक्रमण के 96 केस सामने आये थे जो 18 मार्च 2020 को 168 हो गये। मात्र आठ दिन में कोरोना के मरीज तीन गुना से अधिक हो गये और 22 मार्च को कोरोना संक्रमितों की संख्या 396 हो गयी। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता से जनता कर्फ्यू लगाने का आहृवान किया। इस जनता कर्फ्यू में लोगों को खुद ही कर्फ्यू लगाते हुए सबकुछ बंद कर अपने घरों मे रहना था। देश की जनता ने पीएम मोदी के आहृवान का पूर्ण सम्मान रखा और इस जनता कर्फ्यू का स्वतः पालन करते हुए इस दिन को इतिहास में दर्ज करा दिया। शाम के समय लोगों ने अपने घरों से ताली-थाली बजाकर कोरोना योद्धाओं का आभार व्यक्त किया जो अपनी जिंदगी दांव पर लगा कर मरीजों का इलाज करने में दिन-रात जुटे हुए थे।
24 मार्च से शुरू हुआ लाॅकडाउन
वैश्विक महामारी कोविड-19 को रोकने के लिये पीएम मोदी ने 24 मार्च से लाॅकडाउन लगाने की घोषणा की तो पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल हो गया। हर कोई जरूरी सामान खरीदने के लिये बाजारों की ओर दौड़ पड़ा। न सामान की क्वालिटी देखी और न ही किसी ने रेट पूछा, जिसको जो मिला उसने खरीद लिया। हालांकि सरकार की ओर से आवश्यक सेवाओं को छूट देने का आश्वासन दिया गया था मगर पहली बार लाॅकडाउन का सामना कर रहे भयाक्रांत लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सामान खरीदते नजर आये। लाॅकडाउन का वह दौर जहां व्यापार जगत के लिये गहन चोट देने वाला था वहीं दैनिक आवश्यकताओं का सामान बेचने वालों के लिये यह दौर मुनाफा कमाने का अवसर बनकर आया। लोगों ने सामान की जमाखोरी की और मनचाहे दामों पर बेचकर खूब मुनाफा भी कमाया। चंद घंटों के लिये खुलने वाली दुकानों पर खाने-पीने का सामान खरीदने वालों की लंबी कतार लगी रहती थी। प्रशासन की सख्ती के बावजूद मुनाफाखोरी नहीं थमी और लाॅकडाउन के चलते आर्थिक संकटों से गुजर रहे लोगों को मुनाफाखोरी का दंश भी झेलना पड़ा.

कोविड गाइडलाइन की सख्ती ने किया परेशान
लाॅकडाउन का पहली बार सामना कर रहे अनेक लोगों को पहली बार कर्फ्यू के हालात देखने को मिले। सड़कों पर निकलने वाले और चेहरे पर मास्क न पहनने वालों लोगों पर डंडे बरसाती पुलिस की वीडियो-फोटो वायरल होती रहीं। वहीं मिल-जुल कर रहने वालों को भी सामाजिक दूरी का पालन करते हुए अपनोें से ही दूरी बनानी पड़ी। सेनेटाइजर संजीवनी समान लग रहा था तो मास्क कोरोना से रक्षा का कवच। किसी भी चीज को छूने से डर, लोगों के पास आते ही मन में दहशत, घर से निकलने पर कोरोना संक्रमण के साथ पुलिस के डंडे का शिकार होने का डर मन में समाया रहता था। वह दौर ऐसा था जब आदमी को आदमी से ही डर लगने लगा था। खुशी में शामिल होना तो दूर, लोगों ने अंतिम संस्कार में भी शामिल होने से परहेज करना शुरू कर दिया था। अर्थी को चार कंघे तक नसीब नहीं होते थे। वहीं कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों के अंतिम दर्शन तक परिवार के लोग नहीं कर पाते थे। अनेक लोगों के लिये वह दौर बुरा समय लेकर आया और उन्हें अपनों को गंवाने के बाद उनका अंतिम संस्कार भी अपनी इच्छानुसार करना नसीब नहीं हुआ।
सड़कें हुईं सूनी, लोग घरों में बंद
24 मार्च को 14 दिन के लिये लगाया गये लाॅकडाउन का हर दिन लोगों ने गिन-गिनकर गुजारा। लोगों को उम्मीद थी की 14 दिनों में कोरोना संक्रमण की चेन को तोड़ा जा सकेगा और वह फिर से सामान्य दिनों की तरह जिंदगी गुजारने लगेंगे। मगर 14 दिन पूरे होने से पहले लाॅकडाउन बढ़ाने की घोषणा ने लोगों को परेशान कर दिया। पहली बार इतना लंबा समय घर की चाहरदीवारी में कैद होकर गुजारने वाले लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि वो करें भी तो क्या। घर से बाहर जाना मना था और जाते भी तो कहां, बाहर भी तो सबकुछ बंद था। पुलिस की घुमती गाड़ियों का सायरन मन में अंजाना सा भय पैदा कर रहा था। वहीं देश के विभिन्न हिस्सों से कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या इशारा कर रही थी की यह लाॅकडाउन 21 दिनों बाद भी समाप्त होने वाला नहीं है। और हुआ भी यही कि लाॅकडाउन का सिलसिला बढ़ता गया और घरों में कैद लोग बेहाल होते गये।
नौकरी गयी, महंगाई बढ़ी
लाॅकडाउन का दंश लोग आज तक सहन कर रहे हैं। लंबे समय तक चले लाॅकडाउन में ऑफिसो से लेकर कारखानें, दुकानें, सिनेमाघर, माॅल्स आदि सबकुछ बंद हो गया। ऐसे में लोगों को नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। एक अनुमान था कि लाॅकडाउन के कारण हुए आर्थिक नुकसान के कारण लाॅकडाउन के दौरान या अनलाॅक शुरू होते ही लगभग 30 प्रतिशत लोगों की नौकरियां चली गयीं। वहीं प्राइवेट सेक्टर में कार्य करने वालों को 40-50 प्रतिशत सेलरी ही संस्थान की ओर से दी जा रही थी। मगर कहीं और काम न मिलने के कारण चल रही नौकरी को आगे बढ़ाना मजबूरी बन गया। वहीं मुनाफाखोरी के कारण महंगाई बढ़ी और तनख्वाह आधी रह जाने के कारण मध्यमवर्ग की कमर टूट गयी। उस दौर मंे आर्थिक संकटों का सामना करने वाले लोग आज भी सामान्य नहीं हो पाये हैं। महंगाई बढ़ी पर हर साल होने वाला इंक्रीमेंट तो दूर पुरानी तनख्वाह पाना भी मुश्किल हो गया।
सड़कों पर पैदल जाते दिखे श्रमिक
लाॅकडाउन का दर्द भरा चेहरा सामने आया सड़कों पर पैदल जाते श्रमिकों को देखकर। गोद में छोटे बच्चे लिये और सिर पर सामान का बोझ उठाये मजदूर सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर का सफर पैदल तय करने निकल पड़े। मन में कोरोना का खौफ था, जेबें खाली थीं तो भूख के मारे अंतड़ियां सिकुड़ी जा रही थीं। मगर रोजगार खो चुके श्रमिकों को ऐसे मुश्किल वक्त में सिर्फ अपने घर की याद आ रही थी। ऐसे में मीडिया रिपोर्ट अखबारों-चैनलों पर आनी शुरू हुई तो सरकार ने तत्परता दिखाते हुए इन श्रमिकों को घर भिजवाने की व्यवस्था की । इन मजदूरों की हालत पर राजनीति भी खूब की गयी और सरकार पर सवाल भी उठाये गये। मगर देर से जागी सरकार ने मजदूरों को खाने से लेकर उनके घर जाने की व्यवस्था कर उनको राहत दिलाने का प्रयास किया।
पुलिस और सामाजिक संगठनों ने निभाई जिम्मेदारी
कोरोना संक्रमण के कारण भारत में करीब 75 दिन तक लाॅकडाउन लगा और लोग अपने घरों में कैद रहे। कंटेनमेंट जोन में तो किसी को भी घर से बाहर झांकने तक की इजाजत नहीं थी। लेकिन लोगों की जरूरतें सिर पर खड़ी थीं। ऐसे में अक्सर लोगों पर डंडे बरसाते दिखती पुलिस का मानवीय चेहरा सामने आया। लोगों के घरों तक दूध, सब्जी, राशन आदि पहुंचाती पुलिस की मानवीयता ने लोगों में पुलिस को लेकर बसी छवि को बदल दिया। संक्रमण काल में जब हर व्यक्ति दूसरे से बचने का प्रयास करता दिखता था तब पुलिसकर्मी अपनी जान दांव पर लगाकर लोगों के घरों तक पहुंचते औैर उनकी जरूरतों को पूरा करते।
वहीं समाजिक संगठनों ने भी कोरोना काल में अभूतपूर्व सेवा करते हुए भूखों का पेट भरने का बीड़ा उठाया। ऐसे लोग जो गरीब- बेसहारा थे और अपनी भूख मिटाने के पर्याप्त साधन जिनके पास नहीं थे उनके लिये सामाजिक संगठन देवदूत बनकर आये। 24 घंटे चलने वाली रसोई में खाना बनता गया और लोगों तक पहुंचता गया। कोरोना काल में किये सेवाकार्यों से सामाजिक संगठनों ने अनगिनत लोगों की भूख मिटाने के साथ अनेक जिंदगियां भी बचाईं। जिसको भी दवा-पैसे आदि की जरूरत पड़ी तो यह सामाजिक संगठन उसकी परेशानी को दूर करते नजर आये।
वर्क फ्राम होम और ऑनलाइन पढ़ाई
कोरोना काल में नयी संस्कृतियों ने भी जन्म लिया जिनके बारे में पहले कभी गंभीरता से सोचा भी नहीं गया था। संक्रमण काल में जब आफिस बंद हुए तो कंपनियों ने अपने कर्मियों से वर्क फ्राॅम होम कराना शुरू किया। आपदा काल में शुरू हुए इस वर्क कल्चर को कंपनियों ने बेहद पसंद किया। कंपनियों ने पाया कि वर्क फ्राॅम होम कराकर वह ऑफिस का खर्च बचा सकती है। वहीं वर्क फ्राॅम होम में कर्मचारियों से ज्यादा काम भी लिया जा सकता है वो भी कम तनख्वाह देकर। ऐसे में अनेक कंपनियां ऐसी हैं जिनके ऑफिस एक साल बाद भी खोले नहीं जा रहे। यह कंपनियां अपने कर्मियों से घर से ही काम करा रही हैं। कई कंपनियां तो अपने कर्मचारियों को घर में ही ऑफिस का सेटअप बनाने के लिये अतिरिक्त भुगतान भी कर रही हैं।
वहीं कोरोना संक्रमण के दौर में जब स्कूल-काॅलेज बंद हुए तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होने लगी। ऐसे में एक विकल्प ऑनलाइन पढ़ाई के रूप में इस्तेमाल किया गया। यह विकल्प पहली बार आजमाया गया इसलिये इसका प्रयोग करने में दिक्कतें भी आयीं। लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई करने के लिये लैपटाॅप से लेकर मोबाइल तक की रिकार्ड खरीदारी की गयी। आज भी अनेक काॅलेजों में ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह की पढ़ाई करायी जा रही है। ऑनलाइन एजुकेशन हमारे जीवन में शामिल हो चुका है और वक्त-वेवक्त इसका उपयोग जारी रहेगा।
फिर मंडरा रहा है कोरोना का खतरा
जनता कर्फ्यू का एक साल होने के बाद भी कोरोना संक्रमण पर काबू नहीं पाया जा सका है। लाॅकडाउन के दौर में जब कोविड-19 गाइडलाइन का सख्ती से पालन कराया जा रहा था तो संक्रमण की रफ्तार थमने लगी थी। इस साल की शुरूआत में लगने लगा था कि जल्द ही संक्रमण देश से समाप्त हो जायेगा। मगर मार्च के महीने में कोरोना संक्रमण ने एक बार फिर से रफ्तार पकड़ ली है। आज देशके 12 राज्योें में कोरोना संक्रमण के आंकड़े डराने वाले हैं। इसका सबसे बड़ा कारण लोगों की लापरवाही है जो मास्क पहनने और सामाजिक दूरी बनाने के नियमों का पालन नहीं कर रहे। ऐसे में एक साल बाद फिर से देश के अनेक राज्यों में लाॅकडाउन का खतरा मंडरा रहा है। कई प्रदेशों ने तो नाइट कर्फ्यू लगाने का ऐलान भी कर दिया है। लेकिन लाॅकडाउन की भयावह यादों को दोहराना नहीं चाहते तो कोविड-19 गाइडलाइन का पालन करना बेहद जरूरी है।

