illustration By Hasan Zaidi
अमित बिश्नोई
पिछले दो सालों से विभिन्न मामलों में फंसे सपा के बड़े मुस्लिम नेता आज़म खान और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव इन दिनों यूपी की सियासत का केंद्र बिंदु बने हुए हैं. टीवी चैनलों के प्राइम स्लॉट और अखबार के पहले पन्नों पर सपा के इन दो पुराने दिग्गजों को जगह मिल रही है. अभी कल ही मैंने कार्टूनिस्ट हसन ज़ैदी का एक कार्टून देखा और कार्टूनिस्ट की सोच के बारे में सोचने लगा. यूपी के मौजूदा हालात पर एक परफेक्ट कार्टून। सोचा कि इतना अच्छा और इतना सच्चा कार्टून बना है तो इसे शब्द भी दिए जाएँ, हालाँकि कार्टूनों को शब्दों की ज़रुरत नहीं होती, फिर भी मैं गुस्ताखी करने पर मजबूर हुआ।
कार्टून में दिखाया गया है कि योगी जी के हाथ में एक जाल है जो बहेलियों के हाथों में देखा जाता है जब वह परिंदों को पकड़ने के लिए निकलता है, बहेलिये के उस जाल में आज़म खान और शिवपाल यादव फंसे हुए हैं. आप योगी जी को सांकेतिक रूप से भाजपा भी मान सकते हैं. कार्टून को देखकर तो यही लगा कि क्या वास्तव में यूपी में इन दिनों जो चल रहा है वह योगी जी के या भाजपा के इशारों पर हो रहा है या फिर यह एक कार्टूनिस्ट की सिर्फ कल्पना है।
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दरअसल विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार यूपी में समाजवादी पार्टी को लेकर जो सियासी गर्मियां तेज़ हुईं और जिस तरह से हुईं वह बहुत से सवालों को जन्म देती हैं. शुरुआत शिवपाल यादव से हुई, चुनाव से पहले अखिलेश के सामने सरेंडर करने वाले चाचा ने भतीजे के खिलाफ बग़ावती तेवर अपना लिए. तेवर भी धमकाने वाले, नहीं सुधरे तो सामने भाजपा का ऑफर है, अचानक कॉमन सिविल कोड का समर्थन करने लगे. चाचा की बग़ावत चल ही रही थी कि रामपुर से आज़म खान के कार्यालय से भी बग़ावत का झंडा बुलंद हुआ, अखिलेश पर आज़म की मदद न करने का बड़ा आरोप लगने लगा, इसी के साथ शुरू हो गया अखिलेश को मुस्लिम विरोधी साबित करने का खेल. पार्टी के अंदर से इस तरह की आवाज़ें उठने लगीं कि अखिलेश मुसलमानों की कोई मदद नहीं करते।
एक ऐसी पार्टी जिसके संरक्षक को मुल्ला मुलायम का नाम तक दे दिया गया उसी पार्टी को मुस्लिम विरोधी साबित करने की एक मुहीम शुरू हो गयी, जिस पार्टी से 34 मुस्लिम विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे उसी पार्टी के मुखिया पर मुसलमानों का दुश्मन होने का आरोप। इन परिस्थितियों पर नज़र दौड़ाने के बाद तो सब कुछ पहले से लिखे गए एक स्क्रीनप्ले जैसा लग रहा है और यहीं से सवाल उठता है कि इस स्क्रिप्ट का राइटर कौन है? कहाँ बैठकर यह पटकथा लिखी जा रही है? धुंधली तस्वीरें साफ़ होने लगती हैं, पता चलने लगता है कि कृत्रिम तौर पर पैदा की गयी इन परिस्थितियों का किसे फायदा हो सकता है?
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अभी हम अगर पिछले तीन दिनों में सीतापुर जेल में बंद आज़म से हुई मुलाकातों की बात करें तो शिवपाल यादव को परमिशन मिल जाती है मुलाकात की, आचार्य प्रमोद कृष्णम भी डेढ़ घंटे जेल में आज़म खान से बात कर आते हैं लेकिन जब लखनऊ मध्य के विधायक रविदास मेहरोत्रा के नेतृत्व में सपा प्रतिनिधिमंडल आज़म से मिलने पहुँचता है तो उसे मिलने की अनुमति नहीं मिलती, मीडिया में खबर चलने लगती है “आज़म ने सपा प्रतिनिधिमंडल से मिलने से किया इंकार”. अखिलेश को भी बैकफुट पर आना पड़ता और इस मुलाकात की कोशिश पर अज्ञानता जतानी पड़ती है।
कहने का मतलब कहीं न कहीं इस विरोध को मिल रही हवा में भाजपा का भी हाथ है, इसे कहते हैं परदे के पीछे से लड़ना। ऐसा नहीं है कि भाजपा शिवपाल या आज़म खान को अपनी पार्टी में शामिल करना चाहती है. ऐसा करके उसे कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिलने वाला, उसका फायदा तो इस बात में ज़्यादा है अखिलेश के मोहरों से ही अखिलेश को घेरा जा सके और भाजपा वही कर रही है. फिलहाल तो सपा के दोनों पुराने धुरंधर भाजपा के जाल में फंसे हुए ही लग रहे हैं. अंत में हसन ज़ैदी साहब को इस बेहतरीन कार्टून के लिए शुक्रिया जिसे हमने शब्दों में गढ़ने का प्रयास किया। सफल रहा या असफल, फैसला तो पाठक ही करेंगे।

