राहुल-प्रियंका, प्रियंका-राहुल, कोई तीसरा नहीं

 
राहुल गांधी  और प्रियंका गांधी

अमित बिश्‍नोई

राजस्थान के शहर उदयपुर में चल रहे नव संकल्प शिविर में पिछले दो दिनों से सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि राहुल गाँधी कब संभालेंगे पार्टी की कमान। हालाँकि अनाधिकारिक रूप से पार्टी की कमान वहीँ संभाल रहे हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी के अंदर अब पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है. इस चिंतन शिविर में भी अधिकांश प्रतिभागी यही मांग उठा रहे हैं कि राहुल गाँधी को यह ज़िम्मेदारी जल्द से जल्द उठा लेनी चाहिए।

वैसे कांग्रेस पार्टी सितम्बर में संगठनात्मक चुनाव कराने का पहले ही ऐलान कर दिया है, ज़ाहिर है कि अध्यक्ष पद के लिए भी चुनाव होगा, लेकिन बड़ा यह सवाल यह है कि अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी से लगातार दूर भाग रहे राहुल गाँधी क्या सितम्बर में होने वाले चुनाव लड़ेंगे। कहीं इसी वजह से विकल्प के रूप में आज प्रियंका गाँधी का नाम किसी रणनीति के तहत उछाला गया है. यह नाम भी पोलिटिकल पैनल की चर्चा में यूपी की ओर से उछाला गया वह भी सोनिया- प्रियंका की मौजूदगी में। 

इस बात का यह भी मतलब निकला जा रहा है कि नेतृत्व के मुद्दे पर कहीं न कहीं पार्टी में मतभेद है. हालाँकि चिंतन शिविर में आधिकारिक रूप से इस बात पर कोई बात नहीं कर रहा है कि अध्यक्ष कौन बनेगा। मगर चिंतन शिविर के बंद पंडालों से छनकर जो ख़बरें आ रही हैं वह यही हैं सभी लोग सोनिया गाँधी पर इस बात के लिए ज़ोर डाल रहे हैं कि वह अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए राहुल गाँधी को राज़ी करें, वहीँ एक ग्रुप ऐसा भी है जो प्रियंका गाँधी को अब पार्टी के अगले अध्यक्ष के रूप में देखने लगा है। 

दरअसल मामला ज़िम्मेदारी का है, पार्टी का जो भी अगला अध्यक्ष बनेगा उसे ज़िम्मेदारियाँ भी लेनी पड़ेंगी, अब ऐसा नहीं चलेगा कि नाकामी का ठीकरा किसी और पर फोड़ा जाय, सामने आकर स्वीकारना होगा और फिर मज़बूती से आगे बढ़ना होगा। आज़ादी के बाद से कांग्रेस को एक तरह से विरासत में सत्ता मिली। नेहरू इंदिरा के बाद पार्टी सुख भोगी राजनीति काफी बढ़ने लगी. अधिकांश समय सत्ता में रहने के बाद सत्ता से बाहर भी गए तो जनता ने फिर से सत्ता में बिठा दिया, इसलिए कांग्रेस पार्टी कभी विपक्ष की राजनीति नहीं कर पायी, उसे विपक्ष की राजनीति करना आता ही नहीं। यह पहला मौका है कि वह सत्ता से इतना दूर हुई है कि उसे अब खुद लगने लगा है कि यह दूरी और बढ़ेगी।

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राहुल गाँधी के साथ भी कुछ ऐसा ही है, उनकी बातें, उनके विचार चाहे जितना अच्छे हों, विजन चाहे जितना क्लियर हो मगर उसे दिशा देने में वह हमेशा नाकाम रहे हैं क्योंकि अपने विजन को सही दिशा देने और उसे मंज़िल तक पहुँचाने के लिए मंज़िल तक साथ चलना पड़ता है मगर वह मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही भटक जाते हैं. उन्हें अक्सर अहम मौकों पर गायब होते हुए देखा गया है. राजनीति में एक कहावत है कि सड़कों पर दिखोगे तभी संसद में पहुंचोगे। यही विपक्ष की राजनीति होती है. आप विपक्ष में हैं इसलिए विपक्षी जैसा व्यवहार भी कीजिये जैसे कभी अंग्रेज़ों के खिलाफ विपक्षी कांग्रेस करती थी.

प्रियंका गाँधी के साथ भी वही बात आती है. चलिए यूपी में आपको बुरी तरह नाकामी मिली, कोई बात नहीं आप हिमाचल में डेरा डाल देतीं. आपका तो घर भी हैं वहां। सरकार का घेराव और पार्टी को मज़बूत करने का काम शुरू कर देतीं। पार्टी महासचिव हैं आप बल्कि उससे बढ़कर ही, सिर्फ यूपी तक सीमित रहना ही आपका फ़र्ज़ नहीं है. आप इसे सुख भोगी राजनीती नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे। कांग्रेस पार्टी की यह बड़ी विडंबना कि उसके पास गाँधी फैमिली के अलावा कोई ऐसा नेतृत्व ही नहीं जो पूरी पार्टी को लेकर चल सके और पार्टी के लोग उसे स्वीकार कर सकें। यहाँ तक की बाग़ी G-23 भी नेतृत्व पर गाँधी फैमिली से इतर नहीं देखते।  

राहुल गाँधी अध्यक्ष बने या प्रियंका, दोनों को विपक्ष की राजनीती क्या होती है और कैसे की जाती है यह जानना और समझना होगा। भाजपा को दशकों लगे विपक्ष की राजनीति करके सत्ता में आने के लिए. वह पूरी तैयारी से आये हैं राज करने के लिए, इसलिए इतनी आसानी से हटने वाले भी नहीं। सोनिया गाँधी ने संकल्प  शिविर के पहले दिन कहा था कि असाधारण परिस्थितियों का सामना असाधारण तरीके से ही किया जा सकता है. सोनिया का यह पैग़ाम पार्टी से पहले राहुल और प्रियंका के लिए है, इन्हें ही तय करने होंगे कि वह असाधारण उपाय क्या होंगे।

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जहाँ तक चिंतिन शिविर के दो दिनों की बात है तो मामला पटरी पर चलता हुआ ही दिख रहा है लेकिन लीडरशिप का मुद्दा बाक़ी सभी मुद्दों से ऊपर ही है, क्योंकि सारे चिंतन और मंथन से जो रणनीति सामने आएगी उसको मूर्त रूप लीडर ही देगा इसलिए कांग्रेस पार्टी को जल्दी से पार्टी के पोस्टर बॉय या पोस्टर गर्ल का नाम सामने लाना ही होगा।