भाकियू चाहेगी किसानों की रिहाई और दर्ज मुकदमों की वापसी
सरकार के लिये मुश्किल होगा कानूनी कार्रवाई वापस लेना

न्यूज डेस्क। एक ओर जहां किसान आंदोलन गति पकड़ रहा है वहीं सरकार की ओर से भी किसानों की मांगों को लेकर सकारात्मक रूख दिखाया जा रहा है। वर्तमान में स्थिति भले ही सरकार विरोधी दिख रही हो मगर यह भी माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में किसान और सरकार के बीच होने वाली बैठक में कोई समझौता अवश्य हो जायेगा। मगर इस समझौते की राह में एक नया रोड़ा इस आंदोलन में गिरफ्तार किये गये किसानो की रिहाई और किसान नेताओं पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग बन सकता है। इन मुद्दों पर सरकार और किसानों के बीच एक नये टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन ने एक बार फिर गति पकड़ी और बड़ी संख्या में किसान भाकियू नेता राकेश टिकैत के समर्थन और कृषि कानूनों के विरोध में उतर आये। इस आंदोलन में वेस्ट यूपी के किसानों की भागीदारी बढ़ने से भारतीय किसान यूनियन के हाथों में नेतृत्व की कमान आ गयी है। हालिया घटनाक्रम के बाद भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत और प्रवक्ता राकेश टिकैत की ओर से पीएम मोदी के प्रति जताये गये सम्मान और बीच का रास्ता निकालने पर सहमति के संदेश के बाद समझौते की राह तैयार हो गयी है। ऐसे में किसान आंदोलन का हल निकलने की संभावनाएं भी बढ गयी हैं। आगामी बैठक में कृषि कानूनों को लेकर किसी निर्णय पर पहुंचने और दोनों पक्षों का सम्मान बरकरार रखने को लेकर अंदरूनी स्तर पर विचार-विमर्श भी किया जा रहा है।
किसान और सरकार कृषि कानूनों पर तो एक राय हो सकते हैं मगर दो मुद्दों पर समझौता अटकने की आशंका भी है। दरअसल किसान आंदोलन में गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुई हिंसा के बाद दिल्ली पुलिस ने जहां सख्त कार्रवाई करते हुए अनेक एफआईआर दर्ज की वहीं बड़ी संख्या में किसानों को गिरफ्तार भी किया है। दिल्ली पुलिस की ओर से किसान नेताओं से लेकर रैली में आने वाले ट्रैक्टरों के मालिक तक को नोटिस भेजे हैं। वहीं किसान नेताओं पर दर्ज मुकदमों में कई गंभीर धाराएं भी शामिल हैं। ऐसे में किसान नेता जहां कृषि कानूनों को लेकर अपना पक्ष रखेंगे वहीं उनकी मांग यह भी हो सकती है कि आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमे वापस लेने के साथ अब तक गिरफ्तार किसानों की रिहाई भी की जाये।
लेकिन सरकार के सामने मुश्किल यह होगी कि यदि दिल्ली हिंसा के मामले में गिरफ्तार लोगों को छोड़ा गया तो सरकार की छवि प्रभावित होेगी। लेकिन जिद पर अड़े किसानों को यह बात समझाना भी मुश्किल होगा और उनकी मांगे पूरी करना भी सरकार के लिये आसान नहीं होगा। हालांकि खुद दिल्ली हिंसा में शामिल लोगों को अपना साथी मानने से इंकार करने और उन पर सख्त कार्रवाई करने की मांग करने वाले किसान नेताओं के लिये भी सभी लोगों को एक साथ रिहा करने की बात कहना आसान नहीं होगा। क्योंकि दिल्ली हिंसा में शामिल लोगों को खुद उपद्रवी बताने वाली भाकियू यदि सभी को निर्दोष बतायेगी तो उसकी छवि भी खराब होने की आशंका है। हां वह यह जरूर कह सकती है कि पुलिस जांच कर दोषियों की पहचान करे और उसके बाद ही कार्रवाई करे।
ऐसे में संभावना इसी बात की है कि इस गंभीर मुद्दे पर पहले जांच और फिर कार्रवाई करने का समझौता तय हो सकता है। किसानों को सशर्त रिहा किया जा सकता है और दर्ज मुकदमों को वापस लेने की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। आने वाले वक्त में क्या होगा यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन सरकार और किसानों के बीच होने वाली बैठक से पूर्व इन मुद्दों पर भी विचार करना और हल खोजना दोनों पक्षों के लिये आवश्यक है ताकि सरकार और किसानों के बीच इस बार होने वाली बैठक कहीं इसी मुद्दे पर बेनतीजा न रह जाये।

