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अपनी सी, अतरंगी सी – दीपावली


अपनी सी, अतरंगी सी – दीपावली

अनुश्री पैन्यूली

‘हम तो ऐसे दिवाली मानते थे !’ – हमने अपने बड़े-बूढ़ों को यह कहते सुना है। निश्चित रूप से यही बात हम भी अपनी आने वाली पीढ़ियों से कह रहे होंगे।  

नए कपड़े, मिठाई, सजावट; पाँच दिनों तक मनाये जाने वाले इस जगमगाते त्यौहार का लोग साल भर इंतज़ार करते हैं। त्रेता में श्री राम इस दिन अपना चौदह वर्ष का वनवास समाप्त करके अयोध्या आये थे और तब से लेकर आज तक हर वर्ष कार्तिक अमावस को यह पर्व मनाया जाता है। बदलते समय के साथ दिवाली के रंग रूप में भी काफी बदलाव आया है।  

हल्दी, गेहूं के आटे, पुष्प इत्यादि से बनायीं जाने वाली रंगोली धीरे-धीरे कृत्रिम रंगो से सजने लगी; और फिर बनाने, रंग समेटने, इतना समय लगाने, जैसे सारे झंझटों का अंत करती हुई बाज़ार में स्टिकर के रूप में मिलने लगी। अब बस सुन्दर, रंगीन स्टिकर लाइए, चिपकाइये  और  रंगोली  तैयार ।


दीपावली के नाम को प्रेरित करने वाले दीपों की प्रभुता भी पहले मोमबत्तियों ने थोड़ी हथियाई और फिर बिजली की टिमटिमाती लड़ियों ने पूर्णतः हड़प ली। लड़ियाँ जहाँ एक तरफ़ सुन्दर होती वहीं दूसरी तरफ़ सुविधा जनक भी। न बार- बार तेल भरने की दिक्कत, न हवा से बचाने की। वैसे तो यह कारण ही लोगों का मन लुभाने के लिए काफी थे, कि तभी आ गयी चीन में बनी लड़ियाँ, बेहद सस्ती। मोमबत्ती, दिये, कंदील, सभी के आकारों में  उपलब्ध। यह लड़ियाँ भले ही चलती ज़्यादा न हो पर अपनी जगह बनाने के लिए इनकी चमक दमक और दाम ही काफ़ी थे। परन्तु इस वर्ष चीन के अन्य उत्पादों की तरह इनको भी अधिकतर भारतीयों ने पराया कर दिया है। 

पहले दिवाली पर शुद्ध देसी घी में मिठाइयाँ बनती थी, पर महंगाई और कपट की मार की वजह से मिठाइयाँ भांति- भांति के तेलों में बनने लगी। यहाँ तक तो बात और मिठाई दोनों ही पचाने लायक थीं, परन्तु फिर मिलावट ने खोये, दूध और पशु चर्बी तक पैर पसार दिए। मिलावटी मिठाइयों के डर ने चॉक्लेट, बिस्किट और अन्य कईं स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों का इस त्यौहार में दाख़िला करा दिया। नमकीन और सोन पापड़ी, जिनकी दिवाली पर पहले बड़ी कम साख हुआ करती थी, उन्हें इस पूरे मिलावट व महंगाई के प्रसंग से काफी शुभ लाभ हुआ।


दिवाली के बदलते रूप में जैसे-जैसे आतिशबाजियाँ बढ़ने लगी वैसे ही इस रात को होने वाला प्रदूषण और पटाखों से होने वाले हादसे भी। इस अति के परिणाम स्वरूप पटाखे जलाने का समय और सीमा दोनों निर्धारित हो गए।

पूजा व मेल मिलाप की परिभाषाएँ भी बदलीं। अब प्रभु श्री राम ही नहीं बल्कि दूर शहरों में काम करने वाले सभी लोग छुट्टियाँ लेकर दिवाली पर अपने घर आते हैं। भाग दौड़ वाले वक़्त में यह त्यौहार एक सूत्र बन गया है जिस बहाने सब लोग साल में एक बार अपने मित्रों व रिश्तेदारों से मिल पाते हैं।

बदलने को तो बहुत कुछ बदला है, परन्तु बदलाव ही जीवन का नियम है। जब तक इस त्यौहार से जुड़ी खुशियाँ, प्यार, उत्साह, विधियाँ बानी हुई हैं, जब तक इस अमावस का श्रृंगार देख पूनम की रातें भी नतमस्तक हो जाती हैं तब तक कहाँ कुछ बदला है?  इस साल हर बार की तरह सब के घर नहीं जा पायेंगे, दोस्तों से मुलाकातें सीमित होंगी; पर फ़ोन से अपनी शुभकामनाएं सब तक पहुंचायेंगे। साथ मिल खरीदारी नहीं कर पाए तो क्या? कौन से कपड़े लिए हैं, क्या सजावट की है – सब तस्वीरों से दिखायेंगे। जो इस पूजा घर नहीं आ पाये उन्हें वीडियो कॉल पर साथ जोड़ कर ही इस बार भी माँ लष्मी का थाल सजायेंगे। हाँ, यह सब भी बदलाव का ही हिस्सा हैं और अगर हम बदलते हुए भी अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों को याद रखें तो बदलाव सुखद है।

आपको और आपके परिवारजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ! 

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