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ममता की छाँव में अखिलेश


ममता की छाँव में अखिलेश

अमित बिश्‍नोई

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा और पीएम मोदी के लिए एक बुरे सपने की तरह हैं, यह भी कह सकते हैं कि वह भगवा ब्रिगेड के लिए ऐसी दुखती रग हैं जिस पर हाथ रखने से भाजपा जहाँ बिलबिला जाती हैं वहीँ पीएम मोदी जी अंदर ही अंदर तिलमिला जाते हैं और इसी बिलबिलाहट और तिलमिलाहट को बढ़ाने आज ममता बनर्जी लखनऊ में अखिलेश के साथ विराजमान थीं. भले ही उनकी पार्टी का यूपी में कोई जनाधार नहीं है लेकिन बंगाल के चुनाव में TMC ने मोदी एंड कंपनी को जिस तरह से धूल चटाई है वह एक नासूर की तरह है, नासूर मतलब वह ज़ख्म जो कभी ठीक नहीं होता और उसके ज़ख्म से निकलने वाला पानी उस ज़ख्म को कभी भूलने नहीं देता।

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अखिलेश भी बड़े सयाने हो चुके हैं और इसी लिए उन्होंने भाजपा की दुखती रग को अपने चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाने का फैसला किया। ममता ने भी उन्हें मायूस नहीं किया और न सिर्फ आज प्रदेश की राजधानी में बल्कि आगे मोदी जी के गढ़ में भी गरजने का वादा किया है. फायर ब्रांड ममता बनर्जी शायद अच्छी तरह जानती हैं कि भाजपा को किस भाषा में जवाब देना चाहिए और इसलिए उन्होंने आज अपनी बात की शुरुआत “पहले माफ़ी मांगो फिर वोट” से की, ममता लगातार गिनाती रहीं कि भाजपा को किस किस बात के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए। ममता ने भाजपा को गंगा में बहाई गयी लाशों पर घेरा, किसानों की मौतों और उन्हें रौंदने की घटनाओं पर सवालों को दाग़ा।

ममता ने जहाँ मुफ्त कोरोना वैक्सीन देने के दावे पर प्रधानमंत्री मोदी को लताड़ लगाई तो वहीँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पूछा कि यूपी में कोरोना से जब हज़ारों लोग मर रहे थे तब आप बंगाल में मेरे खिलाफ चुनाव प्रचार कर रहे थे. ममता ने पीएम मोदी से पूछा, किसने दिया आपको मुफ्त वैक्सीन का पैसा, जनता के पैसे से वैक्सीन बांटकर दावा खुद वैक्सीन बांटने का?, क्या अपनी जेब से पैसा लगाया? ममता ने हाथरस, उन्नाव हर जगह का ज़िक्र किया, बेहद सधे और अपने ही नुकीले अंदाज़ में.

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अखिलेश की तरह ममता ने भी भाजपा को झूठी पार्टी करार दिया और केंद्र सरकार पर राज्यों का हिस्सा हड़पने का भी आरोप लगाया। ममता यूपी चुनाव को एक लम्बी लड़ाई और अखिलेश को अपना भाई बताती हैं और कहती हैं इस लड़ाई में सबको सपा का साथ देना चाहिए। ममता ने इशारों इशारों में भाजपा और ओवैसी को भी एक ही थैली का चट्टाबट्टा बताते हुए कहा कि यह सब चुनावी कोयल हैं जो पांच साल बाद चुनावों में कू कू करने आ जाती है फिर दिल्ली और हैदराबाद लौट जाती हैं. ममता ने याद दिलाया कि बंगाल चुनाव में ओवैसी की पार्टी का क्या हाल हुआ था. दरअसल ऐसा कहकर ममता ने अपरोक्ष रूप से अल्पसंख्यकों के एक बड़े समुदाय को यह बताने की कोशिश कि जिस तरह पश्चिम बंगाल के चुनाव में वहां के अल्पसंख्यकों ने एक जुटता दिखाई वही एकजुटता यूपी में भी दिखाने की ज़रुरत है.

ममता हो और खेला न हो, ऐसा हो नहीं सकता। दरअसल “खेला होबे” ममता का वह हथियार साबित हुआ जिसने सर्वसाधन संपन्न भाजपा को चारों खाने चित करने में मदद की. ममता ने अब अपने इस नारे को पार्टी का ब्रैंड बना लिया है और इसी ब्रांडेड नारे के सहारे वह बंगाल से आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं. लखनऊ में भी उन्होंने खेला होबे का नारा दिया। ममता का वाराणसी में चुनाव प्रचार का एलान करना भी उनकी इसी रणनीति का एक हिस्सा है. वह भाजपा और मोदी को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहतीं। TMC प्रमुख का अखिलेश को समर्थन करना सपा के वोट बैंक में कितना इज़ाफ़ा करेगा इसके बारे में अनुमान लगाना काफी मुश्किल है. मुझे लगता है ममता अखिलेश के लिए वोट बढ़ाने नहीं बल्कि सपा के वोटबैंक को एकजुट करने आयी हैं. भाजपा के खिलाफ वह एक सफल सिपहसालार रही हैं और सफल व्यक्ति की बात पर लोग भरोसा आसानी से करते हैं. मेरी बात आप लोग समझ रहे हैं न!

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बहरहाल ममता का समर्थन सपा के लिए एक शुभ संकेत की तरह है. प्रेस वार्ता के बहाने ममता ने यूपी की चुनावी गर्मी को तो बढ़ा ही दिया है, अब देखना होगा कि भाजपा इस बढ़ी हुई गर्मी को कैसे शांत करेगी?

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