मंदिर मठो के उत्तराखंड में हर मंदिर की अपनी एक मान्यता और अपना एक इतिहास है. आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताते है जिसकी पूजा बदरीनाथ मंदिर से पहले की जाती है. कहा जाता है कि बदरीनाथ से पहले भगवान् विष्णु इसी मंदिर में विरजमान थे. मान्यता है कि त्रेता,द्वापर और सतयुग में इसी मंदिर में श्रीहरि निवास करते थे. आदिबद्री के नाम से जानने वाला यह मंदिर न केवल प्राचीन कला कृति की एक अनूठी मिसाल है बल्कि इस मंदिर के साथ अनेको अनेक धार्मिक मान्यताएं भी जुडी हुई है.
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‘आदिबद्री’ मंदिरो का एक समूह
उत्तराखंड के पंच बद्री (आदि बद्री ,योग बद्री, ध्यान बद्री,बद्रीनाथ और भविष्य बद्री) में से एक आदिबद्री को भगवान् विष्णु के कलयुग से पूर्व के निवास स्थान के रूप मे देखा जाता है. मान्यता है कि कलयुग के समाप्त होने के बाद भगवान् विष्णु भविष्य बद्री में जाकर अंतर्ध्यान हो जायेंगे. आदिबद्री मंदिर वास्तुकला के एक अनूठे उदाहरण के तौर पर भी देखा जाता है. यह मंदिर 16 मंदिरों का एक समूह है जिसमे आज के समय में 14 मंदिर ही बचे हुए है. माना जाता है कि यह मंदिरों का समूह 8वी सदी में बनाया गया था. इन मंदिरों की बनावट गढ़वाल के अन्य मंदिरों से बिलकुल ही अलग है. मुख्य मंदिर दूसरे मंदिरों से काफी बड़ा है. जिसमे भगवान् विष्णु की छवि काली शिला पर दर्शन देते हुए दिखाई देती है.मंदिर के ठीक सामने उनके वाहन गरुड़ का मंदिर है. इनके अलावा भगवान् सत्यनारायण, लक्ष्मी नारायण,भगवान् राम ,सीता, लक्षमण, हनुमान, माँ गौरी, काली ,अन्नपूर्णा,चकरभान, भगवान् भोलेनाथ और कुबेर का मंदिर विरजमान है. कुबेर का मंदिर बिना मूर्ति के है. काफी समय पहले कुबेर की मूर्ति को चोरो द्वारा चुरा लिया गया था. तब से यह मंदिर बिना मूर्ति के है.
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भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने किया जीर्णोद्धार
कर्णप्रयाग से करीब 17 किलोमीटर दूर चांदगढ़ी के पास यह मंदिर स्थित है. आदिबद्री को लेकर माना जाता है कि आदिगुरु शंकराचार्य ने इन मंदिरों का निर्माण 8 वी सदी में कराया था. जबकि भारतीय पुरातात्विक संर्वेक्षण इन मंदिरों के निर्माण को लेकर अलग राय रखता है. उसके अनुसार इन मंदिरों का निर्माण 8-11 वी सदी के बीच कत्यूरी राजाओं के द्वारा कराया गया था.

