विश्वगुरु की इमेज पर लगा तगड़ा डेंट

आर्टिकल/इंटरव्यूविश्वगुरु की इमेज पर लगा तगड़ा डेंट

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अमित बिश्नोई
पांच फरवरी का दिन भारत की धरती पर तीन घटनाएं हुईं, एक तो दिल्ली विधानसभा के लिए मतदान हुआ, दूसरा प्रधानमंत्री मोदी ने प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ में संगम नोज़ पर जाकर कड़ी सुरक्षा में पवित्र डुबकी लगाई, ये दोनों घटनाएं जो भारत जैसे देश के लिए कोई नई बात नहीं हैं क्योंकि देश में हमेशा कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं या होने वाले होते हैं और प्रधानमंत्री उन चुनाव के बीच अक्सर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान करते रहते हैं और मीडिया दिन भर इन ख़बरों को प्राथमिकता के आधार पर कवर करता है. कवर ही नहीं करता बल्कि दिन भर वो आपके दिमाग़ में इस तरह की घटनाओं को ज़बरदस्ती ठूंस देता है ताकि आपका ध्यान वहीँ पर ही केंद्रित रहे और किसी भी अन्य घटना को देखने की कोशिश न करे. पांच फरवरी को भारत में एक और भी घटना हुई जिसे मीडिया ने पूरी तरह छिपा दिया, या कह सकते हैं कि छिपाने की कोशिश की, हालाँकि पूरी कोशिश के बाद भी न तो सरकार और न ही उसका समर्थक मीडिया इस घटना को छिपा सका. घटना यह थी कि भारत की धरती पर एक अमरीकी सैन्य विमान उतरा, बेशक सरकार की अनुमति से ही उतरा होगा। सवाल किसी दूसरे देश के सैन्य विमान के भारत की सरज़मीं पर उतरने का नहीं है, हालाँकि सवाल तो है? सवाल इस बात को लेकर है कि उस अमरीकी सैन्य विमान में सौ से ज़्यादा भारतीय जो डंकी रुट से अमरीका रोज़ी रोटी कमाने गए थे, उन्हें अमरीका में गिरफ्तार करके भारत डिपोर्ट कर दिया गया, सवाल डिपोर्ट करने का भी नहीं है क्योंकि यह सभी अमरीका में अवैध प्रवासी थे, उन्हें डिपोर्ट किया गया, आज नहीं तो कल उनके साथ ऐसा होता लेकिन उन्हें जिस तरह डिपोर्ट किया गया उसने विश्वगुरु कहलाये जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी जो संयोग से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बहुत बहुत करीबी दोस्त हैं (ऐसा मोदी जी और उनके समर्थक समझते हैं ) की इमेज को बड़ी ठेस पहुंचाई। यह सभी डिपोर्ट किये गए लोग जिनमें से अधिकांश उनके गृह राज्य गुजरात से थे, उनके पैरों में बेड़ियाँ और हाथों में हथकड़ियां पड़ी हुई थीं. एक सवाल सभी के मन में उठा कि यह किस तरह की दोस्ती है, यह किस तरह के विश्व गुरु हैं जिनके नागरिक किसी दुर्दांत अपराधी की तरह देश वापस भेजे गए.

इस घटना को पूरी तरह छुपाने की कोशिश की गयी. मीडिया को पूरी तरह अमृतसर एयरपोर्ट से दूर रखा गया और मीडिया ने भी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई वरना यही मीडिया किसी अन्य अवसर पर एयरपोर्ट के आसपास के खेतों में छुपकर उस अमरीकी सैन्य विमान के भारत की धरती पर उतरने की लाइव कवरेज कर रहा होता। यूक्रेन युद्ध के नज़ारे लोगों को शायद याद भी होंगे कि किस तरह यूक्रेन से भारतीय छात्रों को युद्ध एरिया से निकालने भारत सरकार के मंत्री अपना विमान लेकर गए और उन्हें लेकर आये, किस तरह से उनसे जयकारे लगवाए गए. किस तरह उसका लाइव कवरेज हुआ लेकिन इस मामले में पूरी सतर्कता बरती गयी कि किसी को कानों कान भनक न लगे. कुछ जगह पर यह खबर ज़रूर चली कि डिपोर्ट किया गया भारतीय जत्था भारत आ गया है, साथ में खबर को बैलेंस करने के लिए इस बात का ज़िक्र ज़रूर किया गया कि मेक्सिको, कोलंबिया और ग्वाटेमाला के अवैध प्रवासियों को भी वापस भेजा गया है, लेकिन इस बात को पूरी तरह छिपाया गया कि उन्हें किस अवस्था में भारत लाया गया. लेकिन दिल्ली विधानसभा के लिए चल रहे मतदान के समाप्त समाप्त होते यह बात लीक होकर बाहर आ ही गयी कि विश्वगुरु के देश के नागरिकों को किसी दुर्दांत अपराधी की तरह उनके मित्र ने भारत पार्सल किया है. इसके बाद तो डिपोर्ट किये लोगों के बयान भी सामने आने लगे, आप बीती भी सामने लगी और यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया कि बड़े अपमानजनक अंदाज़ में भारतीय नागरिकों को ट्रम्प ने अपने दोस्त से मुलाकात से पहले गिफ्ट के तौर पर भेजा है. यहाँ बता दूँ कि प्रधानमंत्री मोदी अगले हफ्ते ही अपने दोस्त से मिलने अमरीका जा रहे हैं, उसी दोस्त से मिलने जिसने अपने राज्याभिषेक में उन्हें आमंत्रित नहीं किया था. उस घटना की भी खूब चर्चा हुई थी.

दरअसल विश्व गुरु मोदी जी की किरकिरी तब और भी होने लगी कि जब यह बात भी सामने आ गयी कि कोलंबिया ने अपनी धरती पर अमरीकी सैन्य विमान को उतरने नहीं दिया। अमरीकी सैन्य विमान कोलंबियन नागरिकों को लेकर हवा में चक्कर लगाता रहा लेकिन कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने देश में दो निर्वासन उड़ानों को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उनके नागरिकों को किस अवस्था में लाया जा रहा है, जो उन्हें बिकुल भी स्वीकार नहीं था और इसीलिए उन्होंने इतना कड़ा प्रतिरोध किया। हालाँकि कोलंबिया के इस कदम से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नाराज़ हो गए और वीज़ा न जारी करने, टैरिफ लगाने और अधिकारीयों की अमरीकी यात्रा रद्द करने की धमकी दे दी और बाद में दोनों के बीच बातचीत के मामले को सुलझा लिया गया. जब कोलंबिया के नागरिक अपनी धरती पर उतरे तो पेट्रो उन्हें रिसीव करने विमान में गए, उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर उसकी तस्वीरें भी पोस्ट कीं. लेकिन यहाँ तो मामला ही अलग रहा, ऐसा लगा जैसे यह कोई बात ही नहीं है. आपके देश के नागरिकों को इस तरह हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर भारत वापस भेजा रहा है और सरकार को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है. यहाँ पर विश्वगुरु की इमेज को कोई नुक्सान नहीं हो रहा है. यह वापस लौटने वालों ने अगर आपबीती नहीं सुनाई होती तो सबकुछ मैनेज कर लिया गया गया था.

ज़ाहिर सी बात है कि देश के नागरिकों के साथ इतना बुरा व्यवहार हुआ और सरकार चुप रही तो विपक्ष का उसे घेरना लाज़मी था और हुआ भी ऐसा है। कल संसद परिसर में विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इस घटना का पुरज़ोर विरोध किया और प्रधानमंत्री मोदी को इस बात के लिए ज़िम्मेदार बताया। विपक्ष के कई सांसदों ने तो विरोध प्रदर्शन के दौरान सांकेतिक तौर पर हथकड़ियां भी पहन रखी थी. इंडिया ब्लॉक का पूरा कुन्बा इस मामले में एकजुट था। राहुल भी थे, खड़गे भी थे , प्रियंका भी थीं और अखिलेश के साथ अन्य दलों के नेता भी. इतना हंगामा होने के बाद सरकार की तरफ से बयान आया कि वो अमरीका से इस सम्बन्ध में विरोध जतायेगा और कहेगा कि आगे से इस तरह अपमानजनक तरीकों को इस्तेमाल न करे. सरकार का यह बयान भी शायद नहीं आता अगर इस तरह मामला न उछला होता। बेशक इन सभी ने अवैध रूप से अमरीका जाकर एक अपराध किया था, उन्हें वापस भेजकर ट्रम्प ने कुछ भी गलत नहीं किया। हर देश को यह अधिकार है कि वो अवैध प्रवासियों को उनके देश वापस भेज दे. ट्रम्प ने सत्ता में आते ही इसके इरादे भी ज़ाहिर कर दिए थे और उन इरादों पर अमल भी शुरू कर दिया है. अमरीका के कानून के हिसाब से उसने वही किया जो उसे करना था लेकिन बकौल गुस्तावो पेट्रो यह हमारे नागरिक हैं जो अमरीका अपराध करने नहीं बल्कि मजबूरी में रोज़ी रोटी कमाने गए थे और वह इस तरह के व्यवहार के बिलकुल भी हकदार नहीं हैं. क्या इस तरह का विरोध हमारे विश्वगुरु को नहीं करना चाहिए था. यहाँ पर भी इमेज को बचाने की कोशिश की गयी कि कहीं रोज़गार सवाल न उठने लगे, जो लगातार उठ भी रहा है. ज़ाहिर सी बात है कि यह लोग किन मुसीबतों और परेशानियों और जान को जोखिम में डालकर अमरीका पहुंचे, सिर्फ इसीलिए कि उन्हें देश में नौकरियां नहीं मिल रही, रोज़गार नहीं मिल रहा. राहुल गाँधी ने अमरीका यात्रा के बाद डंकी रुट का मुद्दा उठाया था, शाहरुख़ खान ने तो फिल्म ही बना डाली, मगर सरकार को तब तक सबकुछ नॉर्मल ही लगा जबतक मित्र ट्रम्प ने बड़े अपमानजनक अंदाज़ में दोस्त को तोहफा नहीं भेजा। कहिये कुछ भी, डंकी मामले ने मोदी जी की तथाकथित विश्वगुरु की इमेज पर डेंट तो ज़रूर मारी है.

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