सोनिया के गुरुमंत्र

 
सोनिया गांधी

अमित बिश्‍नोई
 
पुनर्गठन, पुनरोत्थान, सामूहिक प्रयास, निजी आकांक्षाओं पर कंट्रोल, पार्टी का क़र्ज़ उतारने की बात, खुलकर बोलने की नसीहत मगर बाहर नहीं, नाकामियों से बाख़बरी, एकता और प्रतिबद्धता, यह कुछ वह गुरु मन्त्र हैं जो आज सोनिया गाँधी ने राजस्थान के उदयपुर के नव संकल्प शिविर यानि चिंतन शिविर में पार्टी के नेताओं को दिए. सम्बोधन में पार्टी के लिए दर्द भी था और लड़ने का जज़्बा भी, नसीहतें भी थीं और अनुरोध भी. परिवार की एक मुखिया की तरह दुलार पुचकार, डांट  डपट, वर्तमान का संकट और भविष्य की रणनीति, सोनिया के भाषण में सबकुछ था.       

वह जब पार्टी के पुरुत्थान की बात कर रही थी तो आज के विषम हालातों का भी ज़िक्र कर रही थी और प्रतिकूल परिस्थितियों से कैसे निपटा जा सकता है इसका उपाय भी बता रही थीं , सोनिया जब कह रही थीं  कि असाधारण परिस्थितियों का सामना असाधारण तरीके से ही किया जा सकता है, तो कार्यकर्ताओं को एक तरह से अपने इरादों को और मज़बूत बनाने का सन्देश दे रही थीं . 

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सोनिया का अपने सम्बोधन में यह कहना की पार्टी को जीवित रखने और आगे बढ़ाने के लिए परिवर्तन लाना होगा. सुधार करने होंगे और इसी के साथ वह सामूहिक प्रयास की बात भी कर रही थीं . चिंतन शिविर को एक प्रभावशाली कदम बताते हुए वह यह भी कह रही थीं कि यह विशाल सामूहिक प्रयास न तो टाले जा सकते हैं और न टाले जायेंगे, मतलब वह लड़ने का अलावा पार्टी के लोगों को कोई और विकल्प नहीं दे रही थीं ।

सोनिया पार्टी पार्टी के नेताओं को अपनी इच्छाओं को कण्ट्रोल करने की भी नसीहत देकर यह जता रहीं थीं कि संगठन से बढ़कर कोई नहीं तभी वह लोगों से पार्टी का क़र्ज़ उतारने की भावनात्मक अपील भी कर रही थीं . वह यह बताना भी नहीं भूलीं कि देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने हम सबको बहुत कुछ दिया है.सोनिया सभी से अपनी बात, अपने विचार खुलकर रखने की अपील भी कर रही थीं मगर इस नसीहत के साथ कि वैचारिक मतभेद की बात पार्टी के अंदर ही रहना चाहिए। बाहर कोई बात जाय तो सिर्फ एकता और प्रतिबद्धता की.  

सोनिया गाँधी ने पार्टी की नाकामियों को भी स्वीकारा और कहा कि हम इन सब बातों से अनजान नहीं हैं मगर वह यह भी बता रही थीं कि उन्हें यह भी मालूम है कि ऐसे हालात से कैसे निकला जाता है. वह यह भी कह रही थीं  कि हमें मालूम है कि देश की जनता की पार्टी से क्या अपेक्षाएं हैं. वह उन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए पार्टी को दिल से प्रयास करने की नसीहत भी दे रही थीं, सोनिया कांग्रेस के स्वर्णिम इतिहास को भी याद दिलाना नहीं भूलीं और बताया कि देश की राजनीति में उसकी क्या भूमिका होती थी, ज़रुरत उसी भूमिका में लौटकर जनता की इच्छाओं को पूरा करने की है. सामूहिक प्रण लेने की बात और चिंतन शिविर से नयी ऊर्जा, नया विशवास और नयी प्रतिबद्धता लेकर निकलने के सन्देश के साथ उनका भावुक भाषण समाप्त होता है.

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चिंतन शिविर से आगे क्या निकलकर सामने आएगा, सोनिया गाँधी द्वारा दिए गुरु मंत्रो पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता कितना अमल करेंगे यह भविष्य की बातें हैं. कांग्रेस पार्टी का यह चिंतन शिविर लगभग 9 वर्षों बाद हो रहा है. पिछले चिंतन शिविर के बाद से अगर देखा जाय तो पार्टी लगातार रसातल में ही गयी है, क्या पिछली भूलों से सबक सीखते हुए कांग्रेस पार्टी इस चिंतन और मंथन से कुछ अमृत निकाल पायेगी।