लेखक: विलियम बॉर्थविक और सिमॉन फैंटाउजो
कलाकार: अक्षय खन्ना, समीर सोनी, विवेक दहिया, प्रवीन डब्बास, गौतम रोड़े, मंजरी फणनीस, मीर सरवर, , अक्षय ओबेरॉय और अभिमन्यु सिंह
निर्देशक: केन घोष
ओटीटी: Zee5
रेटिंग: 2
पवन शर्मा
ZEE5 के नहीं चल रहे अच्छे दिन,
अक्षय खन्ना की अच्छी कोशिश के बाद भी नहीं बन पाई बात
एक होता है हीरो और दूसरा होता है कलाकार, अक्षय खन्ना को हम एक बेहतरीन कलाकार के रूप में जानते है। वह जब भी स्क्रीन पर उतरते है तो दर्शकों उनसे काफी उम्मीद होती है, Dil Chahta Hai, Gandhi My Father, Section 375 जैसी तमाम फिल्में उनकी बेहतरीन अदाकारी की गवाह है, पर इधर कुछ समय से उन्हें कोई ख़ास सफलता नहीं मिली है. जिसके बाद उन्होंने डिजिटल दुनिया में कदम रखा है ।
State of Siege Temple Attack एक ऐसा वाक्या है, जिसने पूरे गुजरात को ही नहीं बल्कि पूरे देश और पूरी दुनिया को दहला दिया था। Zee5 ने इसी कहानी को दर्शकों के सामने पेश करने की कोशिश की है, केन घोष द्वारा निर्देशित ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक सच्ची घटनाओं पर आधारित बताई जा रही है’ जिसकी शुरुआत काफी अच्छी है, मगर आगे चलके कुछ खास देखने को नहीं मिलता है, मूवी कश्मीर से गुजरात आते-आते काफी कमजोर हो जाती है |
स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’Zee5 की ‘स्टेट ऑफ सीज’ फ्रेंचाइजी की अगली कड़ी कही जा रही है लेकिन दोनों में कही कोई समानता नहीं दिखती है. ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ मे एनएसजी कमांडोज की कहानी को पूर्ण रूप से दर्शाने की कोशिश की गई है, मगर दिक्कत तब आती है जब इस कहानी में राजनीति एंगल आ जाता है | देश की राजनीति में सब कुछ साफ-साफ है। राजनीती बस अब हम और तुम तक सिमट कर रहे गई है इसी वजह से ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ जैसी कोशिशें हमारे गले नहीं उतर पाती |
देश में 19 साल पहले तहलका मचा देने वाली अक्षरधाम मंदिर पर हमले की घटना को कृष्णधाम बना दिया गया आखिर क्योँ, माना सच्ची घटनाओं पर फिल्म बनाने में कई दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है पर अगर फिल्म बनाई ही गई है तो क्योँ न हम उसके साथ न्याय करे |
स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ की शुरूआत में ही बता दिया जाता है कि ये फिल्म सच्ची नहीं है। उसके बाद भी हम उम्मीद बांधे रखते है क्यों, क्योंकि अपने इंचार्ज का आदेश न मानकर एनएसजी टुकड़ी को लीड कर रहा भारत का जवान जब जान जोखिम में डालता है तो हर हिंदुस्तानी के दिल से सिर्फ दुआ निकलती है । शुरू के 10 मिनट तक फिल्म देख कर लगता है कुछ तो बात है, पर उसके बाद फिल्म बिखरना शुरू हो जाती है |
किरदार मसाला फिल्मों से निकाले लगते हैं। जिनके हिंदी सिनेमा खून में दौड़ता है वो इसके सारे अगले सीन पहले वाले सीन में ही बता देंगे | पटकथा और निर्देशन में कमजोर होने के बाद बात आती है अदाकारी की जंहा अक्षय खन्ना ने भरसक प्रयास किया है पर हैं तो वो भी इंसान ही, बाकी कलाकार भी बस जैसे-तैसे अपने काम को अंजाम देते दिखते हैं। फिल्म तकनीकी तौर पर भी अपनी चाप नहीं छोड़ पाती है।Zee5 की इस फिल्म को समय आप अपने रिस्क पर दे सकते है

