राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का वो हाल कि जैसे जैसे दवा की मर्ज़ बढ़ता गया. कल के घमासान के बाद मामला अब दिल्ली दरबार लौट गया है, फैसला सोनिया गाँधी को करना है. विधायकों के कन्धों पर बन्दूक तो गेहलोत ही चला रहे हैं लेकिन कह रहे हैं इसमें हमारा कोई हाथ नहीं , जब विधायक ही इतना नाराज़ हैं तो मैं क्या कर सकता हूँ लेकिन विधायकों के बीच आग लगाने वाला कौन है यह सभी जानते हैं. फ़िलहाल शह और मात का खेल चल रहा है. विधायकों की अनुशासनहीनता, खुली बग़ावत, गेहलोत से प्रेम और पायलट से नफरत। एक फ़िल्मी ड्रामा चल रहा है राजस्थान में.
आलाकमान के भेजे गए पर्यवेक्षक मुंह पीटते हुए दिल्ली वापस आ गए हैं, इन लोगों से गेहलोत समर्थक विधायकों ने मिलना तक पसंद नहीं किया। अजय माकन इससे भन्नाये हुए हैं, कह रहे हैं कि यह तो सरासर आला कमान का अपमान है, हम आलाकमान के नुमाइंदे हैं, निर्देशों का पालन न करना मतलब आला कमान को चुनौती देना है. उधर म्यान से तलवारें खींचे गेहलोत समर्थक विधायक पीछे हटने को तैयार नहीं, कह रहे हैं कि राजस्थान में चलेगी तो उन्ही की. आला कमान कौन होता है अपनी मर्ज़ी थोपने वाला। 2020 की बगावत के लीडर को कैसे अपना मुखिया मान लें. गेहलोत के अलावा अगर कोई और सीएम बनता है तो उन्हीं में से बनेगा जो बग़ावत के समय एकजुट रहा. कहने का सीधा मतलब राजस्थान की कुर्सी पर गेहलोत का ही कोई नुमाइंदा बैठ सकता है कोई दूसरा नहीं, आला कमान कहे तब भी नहीं.
भारत जोड़ो यात्रा पर निकली कांग्रेस पार्टी के लिए वाकई ये बड़े इम्तेहान की घडी है, विधायकों का इस तरह खुले आम सामानांतर बैठक करना, सामूहिक इस्तीफे का प्रस्ताव पास करना, पार्टी आला कमान को खुली धमकी देना किसी भी पार्टी के लिए मुश्किल की घडी हो सकती है. कांग्रेस तो पहले से ही मुश्किल में है. ऐसे में उसके पास क्या विकल्प हैं यह तो समय ही बता सकता है. अशोक गेहलोत इस समय अपने लम्बे राजनीतिक तजुर्बे का बड़ी अच्छी तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, परदे के पीछे रहकर। हालाँकि यह पर्दा बड़ा झीना है, पीछे कौन खड़ा है साफ़ नज़र आ रहा है. राहुल ने वेणुगोपाल को यात्रा छोड़कर एक सन्देश के साथ दिल्ली रवाना किया है, इधर राजस्थान गए पर्यवेक्षक अपनी रिपोर्ट तैयार करने में लगे हैं जो उन्हें सोनिया गाँधी को सौंपनी है. अब इस रिपोर्ट में क्या होगा और राहुल ने वेणुगोपाल को क्या सन्देश देकर दिल्ली भेजा है, जल्द ही सामने आ जायेगा।
फिलहाल लगता तो यही है कि राजस्थान पर मनोरंजन का ये खेल 30 सितम्बर या कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव का नतीजा आने तक जारी रहेगा। ये बात इसलिए भी कही जा रही है कि गेहलोत समर्थक विधायकों की तीन मांगों में से एक मांग ये भी है कि गेहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद ही उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना चाहिए।इस शर्त में बहुत कुछ छुपा हुआ है, गेहलोत के अध्यक्ष बनने के बाद उनके हाथ बहुत सी पावर भी आ चुकी होगी क्योंकि भले ही वो गाँधी फैमिली के वफादारों में शामिल हों मगर निजी महत्वाकांक्षाएं वफ़ादारी पर हमेशा भारी पड़ती हैं. आज़ाद भी गाँधी फैमिली के वफादारों में से ही थे, फिर यहाँ तो सीएम की कुर्सी का सवाल है. दूसरी बात यह भी हो सकती है कि गेहलोत अध्यक्ष पद का चुनाव हार जाएँ, तो फिर कहाँ जायेंगे। चुनाव है, कुछ भी हो सकता है, थरूर को हो सकता है लोग उतना न पसंद करते हों लेकिन यही बात गेहलोत पर भी लागू होती है. इस चुनाव में आम वोटर नहीं डेलीगेट्स वोट करेंगे, वैसे भी डेलीगेट्स अक्सर बड़े डेलीकेट होते हैं , जो उनकी नज़ाकत को समझ गया वो बाज़ी मार गया. फिलहाल अभी राजस्थान कांग्रेस पार्टी के लिए रणस्थान बना हुआ है. अब यहाँ की कहानी में पैदा हुई उलझन को सुलझाने के लिए फिर दिल्ली भेजा गया है, देखना है कि कहानी सुलझती है या फिर और उलझती है.

