लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के फेल फॉर्मूले के बाद अब मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर काम करने का निर्णय लिया है। बसपा का यह निर्णय समाजवादी पार्टी के लिए मुसीबत ला सकती है। गौरतलब है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों का एकतरफा वोट सपा को गया था। जिसका असर यह रहा कि उसने विधानसभा में अकेले 111 सीटें हासिल कीं। समाजवादी पार्टी का एमवाय समीकरण यानी मुस्लिम-यादव गठजोड़ सत्ता दिलाने में भी कामयाब रहा है। अधिकांश चुनावों में मुस्लिम सपा के साथ रहे हैं। 2007 में बसपा को मुस्लिमों ने वोट किया था और ब्राह्मण-अतिपिछड़ों के साथ मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने में कामयाब हो गई थीं। मायावती को अब यह समीकरण एक बार फिर याद आने लगा है। हालांकि 2022 के चुनाव में उन्होंने ब्राह्मणों को साथ लाने की कवायद की थी लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी थी। ऐसे में मायावती अब मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ने की कवायदों में लग गईं हैं।
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गुड्डू जमाली के जरिये संदेश देने की कोशिश
बसपा ने आजमगढ़ के व्यवसायी और सबसे अमीर विधायक रह चुके गुड्डू जमाली को पार्टी में वापस लाने के साथ ही आजमगढ़ से लोकसभा के उपचुनाव में प्रत्याशी बनाकर संदेश देने की कोशिश की है। इसके बाद सियासी गलियारों में चर्चा है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी की भी मायावती से मुलाकात हो चुकी है और वो कांग्रेस छोड़कर बसपा में वापसी कर सकते हैं। इसके अलावा तमाम आरोपों के बाद भी मायावती ने शमसुद्दीन राइन को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। ऐसे में मायावती अब अपने इरादे जाहिर इस पर काम करना भी शुरू कर चुकी हैं।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ सत्ता का माध्यम
यूपी में करीब 22 फीसदी दलित वोट बैंक है तो वहीं मुस्लिम वोटरों की संख्या भी करीब 20 फीसदी मानी जाती है। ऐसे में मायावती की कोशिश है कि दलित और मुस्लिम गठजोड़ का फॉर्मूला सधता है तो सीधे सत्ता मिल सकती है। हालांकि बसपा के सामने दलित वोट बैंक को रोके रखना और हासिल करने की भी चुनौती है। 2022 के चुनाव ने बसपा के सामने अस्तित्व बचाने का संकट ला दिया है। इसके बाद भी मायावती अगर दलितों और मुस्लिमों को समझाने के साथ जोड़ने में कामयाब होती हैं तो एक बार फिर बसपा के उदय को रोका नहीं जा सकता है।
सपा के सामने मुश्किलें
यूपी में मुस्लिमों की पहली पसंद हमेशा सपा रही है। ऐसे में बसपा की कोशिशें उसके सामने मुश्किलें खड़ी कर सकतीं हैं। माना जा रहा है कि बसपा की इस नीति की काट के लिए मुस्लिम लीडर को आगे किया जा सकता है। वर्तमान समय में सपा में भी मुस्लिम चेहरों की कमी है। अहमद हसन की चुनाव के पहले मौत हो चुकी है। वहीं आजम खां फिलहाल जेल में हैं। बेटा अब्दुल्ला आजम पर भी केस है और फिलहाल विधायक हैं। ऐसे में सपा की कोशिश होगी कि अब्दुल्ला आजम जैसे चेहरों को आगे कर मुस्लिमों को जोड़ा जाए।

