OSM सिस्टम बना CBSE विवाद की सबसे बड़ी वजह
लखनऊ/नई दिल्ली । CBSE की 2026 की 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणामों ने लोगों को चौंका दिया। उम्मीद से काफी कम अंक आने पर छात्र—छात्राओं में मायूसी की लहर दौड़ गई। 13 मई को परिणाम जारी होने के बाद हजारों छात्रों और अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर कम अंक मिलने, स्टेप मार्किंग न दिए जाने और डिजिटल मूल्यांकन में तकनीकी गड़बड़ियों के आरोप लगाए। राजधानी के कई स्कूल तो उम्मीद के मुताबिक रिजल्ट न आने से अपने टापर बच्चों की खुशी तक नहीं मना पाये। देखते ही देखते मामला राष्ट्रीय बहस बन गया और सोमवार 18 मई तक शिक्षा मंत्रालय को सफाई देने के साथ राहत कदमों की घोषणा भी करनी पड़ी।
दरअसल, इस वर्ष CBSE ने पहली बार बड़े स्तर पर “ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम” लागू किया। इसके तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर परीक्षकों के पास डिजिटल रूप में भेजा गया। बोर्ड की मंशा मूल्यांकन प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की थी, लेकिन रिजल्ट सामने आने के बाद कई छात्रों ने दावा किया कि उनकी अपेक्षा से काफी कम अंक आए हैं। सबसे अधिक शिकायतें फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और अकाउंटेंसी जैसे विषयों में सामने आईं।
कई छात्रों का कहना है कि जिन सवालों के पूरे स्टेप लिखे गए थे, उनमें एक भी अंक नहीं दिए गए। कुछ छात्रों ने यह आरोप भी लगाया कि स्कैन की गई कॉपियों में डायग्राम और ग्राफ स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे, जिससे मूल्यांकन प्रभावित हुआ। अभिभावकों ने भी सवाल उठाया कि अगर छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं तो बोर्ड परीक्षा में अचानक इतने कम अंक कैसे आ सकते हैं।
विवाद बढ़ने पर CBSE ने सफाई देते हुए कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह तय मानकों के आधार पर की गई है और सिर्फ जांच का माध्यम बदला गया है। बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार डिजिटल प्रणाली से टोटलिंग और पेज मिस होने जैसी पारंपरिक गलतियों में कमी आई है। बोर्ड ने यह भी दावा किया कि शिक्षकों को पहले से प्रशिक्षण दिया गया था ताकि ऑन स्क्रीन मूल्यांकन में किसी प्रकार की दिक्कत न आए।
कैसे काम करता है OSM सिस्टम?
पारंपरिक व्यवस्था में परीक्षक छात्रों की वास्तविक उत्तर पुस्तिकाओं को हाथ में लेकर जांच करते थे। लेकिन OSM सिस्टम में सबसे पहले छात्रों की कॉपियों को हाई-रेजोल्यूशन स्कैनर से डिजिटल फॉर्मेट में बदला जाता है। इसके बाद ये स्कैन कॉपियां एक सुरक्षित सर्वर पर अपलोड होती हैं और फिर परीक्षकों को कंप्यूटर स्क्रीन पर जांच के लिए भेजी जाती हैं। परीक्षक स्क्रीन पर उत्तर पढ़कर सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अंक दर्ज करते हैं। सिस्टम खुद टोटलिंग करता है, जिससे अंक जोड़ने में गलती की संभावना कम हो जाती है। बोर्ड का दावा है कि इससे कॉपी बदलने, पेज मिस होने या अंक गलत चढ़ने जैसी समस्याओं पर रोक लगती है।
शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि OSM सिस्टम भविष्य की जरूरत हो सकता है, क्योंकि इससे बड़े स्तर पर परीक्षा प्रबंधन आसान होता है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि भारत जैसे विशाल परीक्षा ढांचे में तकनीक लागू करने से पहले पर्याप्त परीक्षण और प्रशिक्षण जरूरी है। उनके अनुसार अगर स्कैनिंग की गुणवत्ता, सर्वर क्षमता और परीक्षकों की डिजिटल ट्रेनिंग मजबूत नहीं होगी, तो ऐसी व्यवस्था छात्रों के भरोसे को कमजोर कर सकती है।
छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से ले रहा मंत्रालय
हालांकि छात्रों के लगातार बढ़ते दबाव और शिकायतों के बाद शिक्षा मंत्रालय को भी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। 17 मई को मंत्रालय की ओर से कहा गया कि कुछ उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग गुणवत्ता खराब पाई गई थी, जिसके कारण हजारों कॉपियों को दोबारा स्कैन कराया गया। कुछ मामलों में मैन्युअल मूल्यांकन भी करवाया गया है। मंत्रालय ने माना कि छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जा रहा है और किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

