स्वामी विवेकानन्द अक्सर कहा करते थे, दिल और दिमाग के संघर्ष में हमेशा दिल की आवाज सुननी चाहिए। यदि मनुष्य अपने मन की सुनता है, तो उसे छाछ मिलती है, लेकिन यदि वह अपने दिल की आवाज सुनता है, तो उसे मक्खन मिलता है। आज मनुष्य हर कदम पर इसी द्वंद्व में जी रहा है। उसकी सोच, कार्य और निर्णय की प्रक्रिया दिल और दिमाग के इसी द्वंद्व से होकर गुजर रही है। क्या सोचना है, क्या नहीं सोचना है, क्या कहना है, क्या नहीं कहना है या क्या करना है या क्या नहीं करना है?
ज्यादातर लोग चिंता, डर और तनाव में फंसे रहते हैं, कई बार उन्हें समझ नहीं आता कि अंदर की आवाज दिल की है या दिमाग की। परिणामस्वरूप मनुष्य मजबूरी एवं जल्दबाजी में गलत निर्णय ले लेता है। अपने कर्मों के फल के कारण मनुष्य को आये दिन दुःख, अशांति और परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मन की शक्ति की कमी के कारण कई बार मनुष्य असहाय हो जाता है। प्रदूषित वातावरण, प्रकृति, बुरी संगति और बुरे संस्कारों से व्यक्ति पराधीन और परेशान हो जाता है।
मूलतः यह मनुष्य की गलती नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी है। दोष वस्तुतः उसकी आन्तरिक शक्तियों की कमी, दुर्बलता एवं अशक्तता में है, जिसका कारण एवं निवारण मनुष्य स्वयं ही है। जब मनुष्य का आत्मबल कम होता है तो उसका मनोबल भी उसी प्रकार कम हो जाता है। साथ ही उसकी बुद्धि, बल और अच्छे संस्कार कमजोर होते हैं। यह जानते हुए भी कि क्या सही है और क्या गलत, कई बार वह सही प्रयास नहीं कर पाता और गलतियाँ करने से बच नहीं पाता। तब वह भविष्य में सही काम करने और गलतियाँ न करने के लिए आवश्यक इच्छाशक्ति जुटाने में असमर्थ हो जाता है। ऐसी स्थिति में इच्छा शक्ति को बल देने वाली शक्ति कमजोर हो जाती है।
इसलिए मानव जीवन एवं कर्म को सही, सुखद एवं सफल बनाने के लिए मानव आत्मबल को बढ़ाने की आवश्यकता है। यानी सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने की जरूरत है. आत्मचेतना एवं चिंतन को बढ़ाना भी आवश्यक है। नकारात्मक ऊर्जा के बढ़ने से आज जीवन और समाज दुख, अशांति, निराशा से घिरा हुआ है। कहते हैं व्यक्ति की जैसी मनोवृत्ति या प्रवृत्ति होती है, वैसी ही उसकी स्थिति होती है और वैसा ही वातावरण होता है। व्यक्ति की मानसिक स्थिति के अनुसार ही उसकी सांसारिक व्यवस्था बनती है।
यदि मन की स्थिति शांत, स्थिर, शीतल, संतुलित, सुव्यवस्थित और सुखद है तो मनुष्य की व्यावहारिक व्यवस्था और स्थिति भी उसी के अनुरूप शुभ, सुखद, सकारात्मक और सुव्यवस्थित हो जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि अंतर्मुखी व्यक्ति हमेशा खुश रहता है और बहिर्मुखी व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है।
प्रायः मनुष्य का मन चंचल, बुद्धि अस्थिर और संस्कार प्रबल होते हैं। विवेक को वश में कर उसे परमात्मा को अर्पित करने से ही मन नियंत्रित होता है। मन को व्यवस्थित करके ही सांसारिक व्यापार एवं कार्य व्यवहार में सफलता प्राप्त की जा सकती है। मन को स्वयं और विवेक के अधीन बनाकर ही हम मन पर विजय पा सकते हैं, और इसे ही ‘मन जीते जग जीते’ कहा गया है.
ऐसे मानसिक और बौद्धिक योग को सहज राजयोग कहा जाता है। इस योग की सरल विधि से सर्वसिद्धि, सुख-शान्ति-समृद्धि एवं सम्पूर्णता प्राप्त होती है। इस राजयोग विद्या के नियमित अभ्यास एवं आचरण से ही हम अपने व्यक्तिगत जीवन एवं सम्पूर्ण विश्व में सतयुगी दिव्य स्वराज्य एवं संस्कृति का पुनः विकास कर सकते हैं।

