नई दिल्ली। भारत के दो राज्य पूरे देश की राजनैतिक दिशा को बदलते हैं। ये दो राज्य उप्र और बिहार हैं। इन दोनों राज्यों के पास प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की मास्टर चाबी है। बिहार में राजनीतिक समीकरण आज शाम से बदल गए हैं। बिहार में महागठबंधन की बयार बह रही है। जिसका सीधा असर देश की सियासत पर पडे़गा। महागठबंधन में नीतीश के शामिल होने से यूपीए को मजबूती मिलेगी। यूपीए में नीतीश का कद भी बढे़गा। पार्टी के अंदर, आरसीपी सिंह के कारण संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा था। पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह के साथ उनके रिश्तों में तल्खी आ रही थी। कभी नीतीश सरकार में आरसीपी टैक्स का जिक्र तेजस्वी यादव ने किया था। आरसीपी सिंह पर पार्टी की ओर से आर्थिक अनियमितता का आरोप है।
कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है। नीतीश कुमार के इसी बयान के साथ बिहार की राजनीति में राजनीति का एक चक्र पूरा हुआ। 2015 में महागठबंधन की सरकार के वे मुखिया बने थे। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने आपस में मिलकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विजय रथ पर ब्रेक लगा दिया था। लेकिन 20 महीने के बाद तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्होंने जुलाईए 2017 में आनन फ़ानन में राजद का हाथ छोड़ते हुए भाजपा से हाथ मिलाया था। इसके बाद लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने कई मौकों पर उन्हें पलटू राम तक कहा था।
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एक बार फिर से दोनों एक साथ हैं। इस महाठबंधन में कांग्रेस की भूमिका बेहद अहम है। भाजपा से अलग होने से पहले नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी से तीन बार लंबी बातचीत की है। राजनीतिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि आने वाले दिनों में यूपीए में नीतीश कुमार को अहम भूमिका मिलने वाली है। महागठबंधन के पिछले समय में यह चर्चा चली थी कि यूपीए का पुनर्गठन किया जाएगा। हालांकि उस दौरान उन्होंने अपने लिए कोई भूमिका नहीं तय की थी। लेकिन संभव है कि इस बार उन्हें कनवेनर जैसा पद दिया जाए। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार यूपीए कनवेनर के तौर पर नीतीश कुमार 2024 में विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा हो सकते हैं। वहीं बिहार की कमान तेजस्वी यादव के हाथ में दे सकते हैं। नीतीश कुमार कह भी चुके हैं कि वे सब कुछ रह चुके हैं। बस एक पद है बाक़ी है।

