नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से विभिन्न पार्टियों के नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए। इनमें भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और दिवंगत नेता अरूण जेटली से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तक शामिल रही हैं। हालांकि उनका लगाया कोई आरोप आज तक किसी अदालत में साबित नहीं हुआ है। लेकिन आरोप लगाने से उन्हें अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक लाभ जरूर हुआ है। इसी के जरिए वे दिल्ली के मुख्यमंत्री तक बन गए। लेकिन अब भाजपा ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उन्हीं के जाल में फंसाने की तैयारी कर ली है। यानी अरविंद केजरीवाल अपने ही बनाए जाल में फंस सकते हैं। भाजपा ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना से आम आदमी पार्टी के उस आरोप की जांच किए जाने की मांग की है। जिसमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने भाजपा पर विधायकों की खरीदफरोख्त कर उनकी सरकार गिराने का आरोप लगाया। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार अगर मामले की जांच होने पर आरोप गलत पाए जाते हैं तो इससे मुख्यमंत्री केजरीवाल और आप पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
संविधान विशेषज्ञों की माने तो मामला मानहानि के दायरे में आता है। संविधान विशेषज्ञा के मुताबिक किसी व्यक्ति या संस्था के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था पर गलत नीयत से बिना कोई आधार के आरोप लगाना आईपीसी की धारा 499 के अंतर्गत अपराध है। आरोप गलत पाए जाने पर आरोपी व्यक्ति को दो साल कैद या फिर जुर्माना दोनों हो सकती है। संविधान विशेषज्ञा की माने तो कानून में इस तरह के मामलों पर कठोर कार्रवाई करने का प्रावधान न होने के कारण भी लोग आरोपों से बच जाते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए देश के गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इंडियन पैनल कोड ‘आईपीसी’ में बदलाव किए जाने की मांग भी की है। इसमें उन्होंने धार्मिक मामलों से लेकर आपराधिक मामलों तक कानूनों में बड़े सुधार की गुंजाइश बताई है।

