उत्तर प्रदेश में होने जा रहे 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत के लिए सीटों पर हो सकते हैं कई प्रयोग
उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी का गठबंधन सीटों के फेर में उलझ गया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच फिलहाल महत्वपूर्ण सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी चल रही है। माना जा रहा है कि अभी दोनों पार्टियों के अध्यक्षों के बीच एक दौर की वार्ता और चलेगी। जिसके बाद ही तय हो पाएगा कि गठबंधन का ये ऊंट किस ओर करवट लेता है। इस वार्ता में सीटों के समीकरण पर फ़िर से मंथन होने के बाद ही दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की संभावित घोषणा हो सकेगी।
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दोहराया जाएगा कैराना का एक्सपेरिमेंट
आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज होने लगी है। सभी राजनीतिक पार्टियां जीत हासिल करने के लिये तमाम तरह के समीकरण तैयार कर रही हैं।राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गठबंधन के साथ ही बीते 2018 के उपचुनाव में किए गए अपने प्रयोग को दोहराने पर भी विचार कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि दोनों पार्टियां कुछ सीटों पर सिंबल और प्रत्याशी की अदला बदली कर सकती हैं। हालांकि ये सीटें कौनसी होंगी, इन पर अभी विचार चल रहा है। ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि ऐसा कर दोनों पार्टियां अपने-अपने प्रत्याशियों को संतुष्ट कर सकती हैं।
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6 से 10 सीटों पर बिगड़ रहे समीकरण
रालोद और सपा के बीच कई सीटों को लेकर एकजुटता हो चुकी है। रालोद के हिस्से में 35 सीटें लगभग फाइनल है। जबकि 6 से 10 सीटों पर दोनों पार्टियों के अध्यक्षों की सहमति नहीं बन पा रही है। इन सीटों में चरथावल,मेरठ कैंट, सिवालखास, बुढ़ाना, बड़ौत, शिकारपुर मांट, खतौली समेत कुछ अन्य सीटें शामिल हैं। इन जगहों पर दोनों ही पार्टियां अपने-अपने मजबूत दावे ठोक रही हैं। वही दूसरे दलों को छोड़कर पार्टी में शामिल हुए लोगों के लिए भी दोनों दल जगह बनाने में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि 2022 में होने जा रहे यूपी विधानसभा चुनाव बहुत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी बिसात बिछाने में कोई चूक नहीं करना चाहती हैं। चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद उनके बेटे चौधरी जयंत सिंह पहली बार राष्ट्रीय लोक दल की कमान अपने हाथ में लेकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी की साख और वोटर्स की उम्मीदों पर खरा उतरने के साथ ही जीत हासिल करने तक उनकी जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ गयी हैं।

