एक ही नाम से मनाए जाने वाला यह पर्व अलग अलग अंदाज और अलग अलग तथियों पर मनाया जाता है
By- Zeba Hasan
नवरोज जिसका शब्दिक अर्थ होता है नया दिन। नवरोज (Nawroz) एक ऐसा पर्व है जो देश के तीन समुदाय अलग अलग दिन और अलग अलग अंदाज में मनाते हैं। कश्मीरी और पारसी समुदाय में नवरोज से से नए साल का आगाज होता है तो शिया समुदाय अपने पहले इमाम को उत्तराधिकार मिलने की खुशी में पसदियों से नवरोज का जष्न मना रहे हैं। खास बात यह है कि एक ही नाम से मनाए जाने वाला यह पर्व अलग अलग अंदाज और अलग अलग तथियों पर मनाया जाता है। कौन सा समुदाय किस तरह मनाता है नवरोज, क्यों मनाते हैं नवरोज पेश है एक रिपोर्ट।
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नज्र का निकलता है मुहूर्त
हर साल शिया समुदाय 21 मार्च को नवरोज का पर्व मनाते हैं। मान्यता है आज ही के दिन पहले इमाम और प्रोफेट मोहम्मद के दामाद हजरत अली इब्ने अबुतालिब को उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। इसी खुशी में शिया समुदाय में जश्न मनाया जाता है। इस जश्न की शुरुआत नज्र से होती है। हर साल इस्लामिक जंतरी देखकर एस्ट्रोलॉजर नज्र का समय (मुहूर्त) बताते हैं। जो समय तय होता है उस समय पर नज्र होती है उसके बाद महफिल और कुछ लोग रंग और केवड़ा गुलाब से होली भी खेलते हैं। इस बार की नज्र 20 मार्च की रात नौ बजकर 2 मिनट पर होनी है। नौरोज के दिन शिया समुदाय विशेष नमाजें अदा कर दुआ भी मांगता है। शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने बताया कि दुनिया भर में शिया समुदाय नौरोज के त्यौहार को बहुत अकीदत से मनाता है। इस दिन रसूले अकरम ने हजरत अली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
फस्ल की हर नई चीज
जनतरी में नवरोज का रंग भी निकलता है। जो रंग निकलता है नज्र में उस रंग की मिठाई को रखा जाता है। मिठाई के साथ फस्ल के सारे नए फलों को रखा जाता है। जैसे बूट चना, रसभरी, शहतूत, खीरा ककड़ी, आम, खरबूज, तरबूज के अलवा बाकी दूसरे फल भी होते हैं। इसके अलावा केवड़े और गुलाब जल को पानी में मिलाकर रखा जाता है। इस पानी को बरकत के लिए पूरे घर के हर कोने में छिड़का जाता है। कुछ घरों में नए कपड़े रखने की परम्परा है। इसके अलावा घर की सफाई और पूरे घर में नई चादरें बिछाने का रिवाज भी देखने को मिलता है।
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सजाई जाती है थाली
इस बार कश्मीरी समुदाय का नौरोज 2 अप्रैल को मनाया जाएगा। चैत्र नवरात्र का पहला दिन कश्मीरी समुदाय नौरोज के रूप में मनाता है और इस दिन से इनके नए साल की शुरूआत होती है। इसके बारे में आरती हुंड्डू ने बताया कि नवरोज पूर्व रात में हम थाली सजाते हैं। इस थाली में चावल, रोटी, खीर, आईना, चांदी का सिक्का, सोने का कोई जेवर, कलम, धार्मिक किताब, दही, फूल, बादाम या अखरोट, मिसरी, बूट चना रखा जाता है। नवरोज के दिन सुबह उठते ही इस थाली में रखे हुए शीशे में चेहरा देखा जाता है फिर जो खाने की चीजें हैं उन्हें खाया जाता है। चावलों में शकर डालकर मीठे चावल बनाते हैं। फिर पूजा और पकवान बनते हैं। लोग इस दिन नए कपड़े भी पहनना पसंद करते हैं।
पारसियों का भी होता है नया साल
पारसी नव वर्ष को नवरोज़ या जमशेदी नवरोज़ के नाम से भी जाना जाता है। इस साल पारसी समुदाय सोमवार, 16 अगस्त 2022 को नव वर्ष मनाएगा। महाराष्ट्र और गुजरात में पारसी समुदाय की अधिकता के कारण इन राज्यों में नवरोज के उत्सव की धूम विशेष रूप से देखने को मिलती है। लोग अपने पारंपरिक परिधान में एक दूसरे से मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। घरों को सजाया जाता है, स्वादिष्ट भोजन और मिठाइयां बनती हैं, एक दूसरे को तोहफे देते हैं। पूजा स्थलों में विशेष आराधना होती है, फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। इस दिन भगवान से परिवार, समाज और देश की खुशहाली की प्रार्थना की जाती है। नवरोज़ या जमशेद-ए-नवरोज़ का त्योहार पारसी राजा, जमशेद के नाम पर रखा गया था, जिन्हें पारसी या शहंशाही कैलेंडर बनाने का श्रेय भी दिया जाता है।
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शाम को होती है पार्टी
ऐसा माना जाता है कि जमशेद ने दुनिया को सर्वनाश होने से बचाया था। राजा जमशेद ने इसी रोज सिंहासन भी ग्रहण किया था, तभी से इस दिन को पारसी समुदाय के लिए नए साल के रूप में मनाए जाने की शुरुआत हुई। मीरा बाई मार्ग स्थित पारसी दुआ का घर में इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है। पारसी समाज के लोग इस दिन तरह तरह के पकवान बनाते हैं। पारसी समुदाय दुआ हाउस में नवरोज के दिन दुआ पढ़ते हैं। वे फल, आईना व गुलाब जल रखकर दुआ मांगते हैं। शाम को सारे लोग मिलकर पार्टी करते हैं, जिसमें नाच गाना होता है। नौरोज पर खाने वाला नहीं पीने वाला फालूदा बनता है। जो तुकमलंगा को रात भर भिगोकर सुबह दूध व गुलाब जल के साथ रूहअफजा डालकर तैयार किया जाता है। पारसी समुदाय में लोग गुलाल लगाकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं। इस समुदाय का ओरीजन ईरान ही है तो पारसी ईरानी फसली नए साल को जमशेदी नवरोज के नाम से मनाते हैं।

