मेरठ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Elections) में जिस दल का बुरा हाल हुआ वो बसपा है। कभी प्रदेश में किंगमेकर की भूमिका में रहने वाली बसपा इस बार मात्र एक सीट पर सिमटकर रह गई है। बसपा की स्थिति अन्य क्षेत्रीय दलों से भी बुरी हो गई है। यहां तक कि बसपा अपना दल, निषाद पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल तक से पिछड़ गई। 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले बसपा को करीब 10 प्रतिशत वोट कम मिले। बसपा के पिछले चुनावी रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पार्टी को 2017 में 22 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे और उसने 19 सीटें हासिल की थीं। 2012 में उसने 80 और 2007 में 206 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
पहले चरण में उन सीटों पर भी वोट डाले गए थे, जिन्हें कभी मायावती और बसपा का गढ़ माना जाता था। हालांकि, साल 2017 के विधान सभा चुनाव में यहां भाजपा ने 53 सीटें हासिल की थीं और मायावती को महज 2 सीटें मिली थीं।
इसके बाद चुनाव प्रचार के दौरान ही भाजपा नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) के बसपा को लेकर दिए बयान से भी बसपा का कैडर मतदाता चकरा गया। तीन चरण पूरे होने के बाद एक एक इंटरव्यू में जब अमित शाह से यूपी में बसपा की प्रासंगिकता के बारे में पूछा गया,तो उन्होंने कहा, ‘बसपा ने अपनी रेलिवेंसी बनाई हुई है। मैं मानता हूं कि पार्टी को वोट आएंगे। लेकिन सीट में कितना कन्वर्ट होगा, वो मालूम नहीं, लेकिन वोट आएंगे।
Read also: अमित शाह ने त्रिपुरा में नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा की
मुसलमान भी बड़ी संख्या में जुड़ेंगे. काफी सीटों पर जुड़ेंगे’। अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) के इस इंटरव्यू के बाद बसपा को भाजपा की बी पार्टी कहा जाने लगा। वहीं खुद मायावती भी पार्टी के चुनाव प्रचार में उस तेजी के साथ नहीं जुटी जिसकी उम्मीद बसपा के उम्मीदवारों ने की थी। बसपा को शुरू तक अपने कैडर वोटों और मुस्लिमों पर भरोसा रहा। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद बसपा के सभी कयास धरे रह गए।

