रंजीता सिन्हा
लखनऊ। कोरोना महामारी के चलते यूपी का जनजीवन भले ठंडा पड़ा हो पर सियासत गर्माई हुई है। भीतर ही भीतर बड़ा घमासान चल रहा है। नेतृत्व बदलेगा या नेतृत्व बदल डालेगा? सवाल बड़ा यह है। संघ, सरकार और संगठन के बीच निरन्तर बैठकों और इन बैठकों में मंथन के दौर जारी हैं। इन कवायदों का अहम मुद्दा यह है कि साल 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व क्या भाजपा को यूपी की सत्ता में दोबारा वापसी करा देगा? अगर नहीं तो क्यों और अगर हां तो क्यों? दिल्ली से लखनऊ पहुंचे संगठन के विशेष दूतों ने इसी का फीडबैक भाजपा के मंत्रियों, विधायकों से लिया है। 5 जून को दिल्ली में संघ प्रमुख मोहन भागवत की बुलाई बैठक में इसी फीडबैक के आधार पर फाइनल प्रस्ताव तैयार होगा जिसपर 15 जून तक हाईकमान के यूपी को लेकर कोई अंतिम निर्णय ले लेने की संभावना है।
असल में कुछ महीनों पहले दिल्ली से आये एके शर्मा जो पीएम मोदी के खासमखास माने जाते हैं, के लखनऊ में कदम रखने के बाद से ही सियासत शुरु हुई। राजनीति की समझ रखने वाले कहते हैं कि शर्मा जी यूं ही नहीं भेजे गये। यह केन्द्र की पॉवर-पॉलिटिक्स की वो चाल है जो गेम-चेंजर साबित होती, पर ऐसा अब तक नहीं हो सका। समीक्षकों की माने तो केन्द्र की मंशा यूपी के नेतृत्व का विकेन्द्रीकरण की थी जो अब तक अंजाम तक न पहुंच सकी। अब इसमें सच्चाई कितनी है यह तो यूपी के नेतृत्व जाने और हाईकमान? बहरहाल इतना तो तय है कि कोरोना ने असहनीय पीड़ा लोगों को दी उसके बाद हाईकमान के मन सवाल है कि क्या होगा 2022 में उत्तर प्रदेश का? संभवत: इसीलिए दिल्ली से आये विशेष दूतों ने यहां मंत्रियों, नेताओं, विधायकों से आज की तारीख में चुनाव होने पर परिणाम की टोह ली।
सच पूछिये तो हाईकमान की संजीदा नजर साल 2024 के लोकसभा चुनाव पर है। राजनीतिक समीक्षक समझते हैं कि, दिल्ली की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही निकलता है। कोरोना की वजह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी की स्थिति इन दिनों कमजोर हुई है। कोरोना महामारी की वजह से फैली अव्यवस्थाओं से जनता के बीच सरकार का नकारात्मक संदेश गया। पंचायत चुनाव में बीजेपी की करारी हार संभवत: इसी का नतीजा रही। इस पंचायत चुनाव ने सीधा केंद्रीय नेतृत्व तक संदेश पहुंचा दिया है कि बीजेपी को अब मजबूत करने की जरूरत है। मिशन 2024 को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ही यूपी में माहौल तैयार करने का जिम्मा शर्मा की के भरोसे है?
इसी सिलसिले में बीएल संतोष और राधा मोहन सिंह की सिलसिलेवार बैठकों के बाद उम्मीद है की राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह भी उत्तर प्रदेश का दौरा करें और यहां के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलकर जमीनी स्तर पर भारतीय जनता पार्टी को मजबूत करने की रणनीति बनाएं। बंगाल में हारने के बाद बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता। दरअसल बीजेपी को पता है कि अगर उत्तर प्रदेश में जरा सी भी ढील दी तो मामला हाथ से निकल जाएगाण् इसलिए महज 1 साल में बीजेपी को जमीन पर और संगठन स्तर पर इतना मजबूत बनाना है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उसे किसी भी समस्या का सामना ना करना पड़े।
बहरहाल, यूपी में मुख्य विपक्षी दल सपा के मुखिया का एक बयान काबिल-ए-गौर है- बीजेपी की नीति पर तंज करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मर्जी के बगैर दिल्ली से भेजे गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक विश्वासपात्र सेवानिवृत्त अधिकारी को उन पर थोपा जा रहा है। अखिलेश ने एक ट्वीट में प्रधानमंत्री के करीबी आईएएस अधिकारी रहे और बीती जनवरी में बीजेपी में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के मौजूदा विधान परिषद सदस्य एके शर्मा की तरफ इशारा करते हुए कहा, अजब है बीजेपी की नीति। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर उनकी मर्जी के विरुद्ध दिल्ली से भेजा एक अधिकारी थोपना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ एक अधिकारी को वहां से दिल्ली बुलाना।
इस बीच उत्तर प्रदेश, कोरोना और पश्चिम बंगाल में हिंसा पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय बैठक बृहस्पतिवार से शुरू हो रही है। बैठक के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित सभी पांचों सह कार्यवाह तीनों दिन उपस्थित रहेंगे।

